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धर्म ग्रंथों में मनुष्य के कौन-से कान को ज्यादा पवित्र माना गया है और क्यों?

मनुष्य के नाभि के ऊपर का शरीर पवित्र है और उसके नीचे का शरीर मल-मूत्र धारण करने की वजह से अपवित्र माना गया है।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Jun 05, 2018, 12:04 PM IST

  • धर्म ग्रंथों में मनुष्य के कौन-से कान को ज्यादा पवित्र माना गया है और क्यों?

    रिलिजन डेस्क।धर्म ग्रंथों में मनुष्य के विभिन्न अंगों के बारे में भी विस्तार से बताया गया है। ग्रंथों में इस बात की जानकारी भी है कि मनुष्य के कौन-से अंग पवित्र हैं और कौन-से अपवित्र। मनु स्मृति के अनुसार, मनुष्य के नाभि के ऊपर का शरीर पवित्र है और उसके नीचे का शरीर मल-मूत्र धारण करने की वजह से अपवित्र माना गया है। यही कारण है कि शौच करते समय यज्ञोपवित (जनेऊ) को दाहिने कान पर लपेटा जाता है क्योंकि दायां कान, बाएं कान की अपेक्षा ज्यादा पवित्र माना गया है। जानिए क्या है इसका कारण…

    1. जब कोई व्यक्ति दीक्षा लेता है तो गुरु उसे दाहिने कान में ही गुप्त मंत्र बताते हैं, यही कारण है कि दाएं कान को बाएं की अपेक्षा ज्यादा पवित्र माना गया है।

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    2. गोभिल गृह्य संग्रह के अनुसार, मनुष्य के दाएं कान में वायु, चंद्रमा, इंद्र, अग्नि, मित्र तथा वरुण देवता निवास करते हैं। इसलिए इस कान को अधिक पवित्र माना गया है-
    मरुत: सोम इंद्राग्नि मित्रावरिणौ तथैव च।
    एते सर्वे च विप्रस्य श्रोत्रे तिष्टन्ति दक्षिणै।।

    3. गृह्यसंग्रह के अनुसार, छींकने, थूकने, दांत के जूठे होने और मुंह से झूठी बात निकलने पर दाहिने कान का स्पर्श करना चाहिए। इससे मनुष्य की शुद्धि हो जाती है।
    क्षुते निष्ठीवने चैव दंतोच्छिष्टे तथानृते।
    पतितानां च सम्भाषे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत्।।

    4. ग्रंथों के अनुसार, हमारे शरीर में पंचतत्वों के अलग-अलग प्रतिनिधि अंग माने गए हैं जैसे- नाक भूमि का, जीभ जल का, आंख अग्नि का, त्वचा वायु का और कान आकाश का प्रतिनिधि अंग। विभिन्न कारणों से शेष सभी तत्व अपवित्र हो जाते हैं, लेकिन आकाश कभी अपवित्र नहीं होता। इसलिए दाएं कान अधिक पवित्र माना जाता है।

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