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लग्जरी आश्रम और कारों में नजर आते हैं साधु-संत, ऐसा होना चाहिए इनका व्यवहार

जोधपुर कोर्ट ने बुधवार को नाबालिग से रेप के आरोप में जेल में बंद आसाराम को दोषी करार दिया है।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Apr 25, 2018, 05:40 PM IST

  • लग्जरी आश्रम और कारों में नजर आते हैं साधु-संत, ऐसा होना चाहिए इनका व्यवहार

    रिलिजन डेस्क. जोधपुर कोर्ट ने बुधवार को नाबालिग से रेप के आरोप में जेल में बंद आसाराम को दोषी करार दिया है। यह पहला मामला नहीं है जब कोई धर्म गुरु इस तरह के मामले में फंसा हो। इसके पहले भी इस तरह के कई मामले सामने आ चुके हैं। ऐसी घटनाओं के बाद लोगों की आस्था का केंद्र रहने वाले धर्म गुरुओं पर से अब लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है।
    पहले के समय में साधु-संतों की अपनी एक मर्यादा होती थी, उसी के अनुसार वे आचरण करते थे लेकिन बदलते समय के साथ साधु-संतों ने अपनी एक अलग मर्यादा बना ली है। साधु-संत अब कुटिया से निकलकर लग्जरी आश्रमों और कारों में अधिक नजर आते हैं। महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामाह ने युधिष्ठिर को साधु-संतों के आचरण संबंधी कई विशेष बातें बताई गई हैं, आज हम आपको ऐसी ही कुछ बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार है-

    1. साधु-संतों को किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए। सूर्य के समान सदा विचरता (घूमते) रहना चाहिए व कभी किसी के साथ दुश्मनी नहीं करनी चाहिए।

    2. अगर कोई बुराई करे तो भी चुप ही रहना चाहिए। घमंड नहीं करना चाहिए। स्वयं कभी क्रोध न करना चाहिए अगर कोई क्रोध करे तो उससे भी मीठा ही बोलना चाहिए।

    3. संन्यासी को चाहिए कि वह अपने घर से निकलकर फिर लाभ और हानि में समान भाव रखे, यदि कोई प्रिय वस्तु मिल भी जाए तो भी उसकी उपेक्षा ही करें।

    4. अपने आंखें, मुख या मन से किसी वस्तु को दूषित न करे अर्थात मन, वचन और व्यवहार द्वारा किसी के प्रति दुर्भाव प्रकट न करे तथा किसी के भी सामने या पीछे उसके दोष न कहें।

    5. लौकिक सुख (लग्जरियस लाइफ) की इच्छा न करें। सोने और बैठने के लिए हमेशा एकांत स्थान का ही चयन करें।

    6. जो मिले उसी में तृप्त और संतुष्ट रहें। प्रणव मंत्र आदि के जप में तत्पर रहें तथा बिना कारण किसी से अधिक बात न करें। किसी वस्तु की इच्छा न करें, सब पर समान भाव रखें।

    7. संत को वाणी, मन, क्रोध, हिंसा व भूख को वश में रखना चाहिए। जहां निंदा या प्रशंसा हो, वहां दोनों में समान भाव रखना चाहिए। संन्यास आश्रम में इस प्रकार का आचरण अत्यंत पवित्र माना गया है।

    8. संत का अपनी इंद्रीयों पर पूरी तरह से नियंत्रण होना चाहिए। संत को गृहस्थ और वानप्रस्थों के साथ संपर्क में नहीं रहना चाहिए।

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