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कबीर जयंती 28 जून को, इनके जीवन से सीखें लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र, जब कबीर ने बताया गृहस्थी का मूल मंत्र

संत कबीर के जीवन में कई घटनाओं से हम लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र सीख सकते हैं।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Jul 12, 2018, 02:02 PM IST

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    रिलिजन डेस्क। कबीरदास 15वीं सदी के प्रसिद्ध कवि और संत थे। इन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज सुधार का काम किया। इनकी रचनाएं सीधे गलत परंपराओं पर चोट करती थी, इस वजह से कई बार इन्हें आलोचना का शिकार भी होना पड़ा। कबीर पंथ नामक धार्मिक सम्प्रदाय इनकी शिक्षाओं के अनुयायी हैं। कबीरदास के जीवन से जुड़ी अनेक ऐसी अनेक घटनाएं हैं, जिनसे हम शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। कबीर जयंती (28 जून) के मौके पर हम आपको कुछ ऐसी ही घटनाओं के बारे में बता रहे हैं…

    जब कबीर ने बताया गृहस्थी का मूल मंत्र
    संत कबीर रोज सत्संग किया करते थे। दूर दराज से लोग उनकी बात सुनने आते थे। एक दिन सत्संग समाप्त होने पर भी एक आदमी बैठा ही रहा। कबीर ने इसका कारण पूछा तो वह बोला, मैं गृहस्थ हूं, घर में सभी लोगों से मेरा झगड़ा होता रहता है। मेरी ये समस्या कैसे दूर हो सकती है? कबीर थोड़ी देर चुप रहे फिर उन्होंने अपनी पत्नी से कहा- लालटेन जलाकर लाओ। पत्नी ने ऐसा ही किया। वह आदमी सोचने लगा इतनी दोपहर में कबीर ने लालटेन क्यों मंगाई?
    थोड़ी देर बाद कबीर ने अपनी पत्नी से कहा- कुछ मीठा दे जाना। इस बार उनकी पत्नी मीठे के बजाय नमकीन देकर चली गई। थोड़ी देर बाद वो आदमी बोला- कबीरजी मैं चलता हूं। कबीर ने पूछा- आपको अपनी समस्या का समाधान मिला या अभी कुछ संशय बाकी है? वह व्यक्ति बोला- मेरी समझ में कुछ नहीं आया। कबीर ने कहा- जैसे मैंने लालटेन मंगवाई तो मेरी घरवाली कह सकती थी कि इतनी दोपहर में लालटेन की क्या जरूरत। लेकिन नहीं, उसने सोचा कि जरूर किसी काम के लिए लालटेन मंगवाई होगी।
    मीठा मंगवाया तो नमकीन देकर चली गई। हो सकता है घर में कुछ मीठा न हो। यह सोचकर मैं चुप रहा। आपसी विश्वास बढ़ाने और तकरार में न फंसने से विषम परिस्थिति अपने आप दूर हो जाती है। उस आदमी को हैरानी हुई । वह समझ गया कि कबीर ने यह सब उसे बताने के लिए किया था। कबीर ने कहा- गृहस्थी में आपसी विश्वास से ही तालमेल बनता है। आदमी से गलती हो तो औरत संभाल ले और औरत से कोई गलती हो जाए तो पति उसे नजर अंदाज कर दे। यही गृहस्थी का मूल मंत्र है।


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    कबीर की बात सुनकर गुरु भी हो गए अचंभित
    कबीरदास बचपन से ही बुद्धिमान थे। उनकी प्रत्येक बात तर्कपूर्ण होती थी, इसीलिए वह गुरू रामानंदजी को प्रिय थे। एक दिन जब श्राद्ध पक्ष चल रहा था और रामानंदजी को अपने पितरों को श्राद्ध करना था। खीर बनाने के लिए रामानंदजी ने कबीर को गाय का दूध लाने के लिए कहा। कबीरदास जब दूध लेने गए तो उन्हें रास्ते में एक मरी हुई गाय दिखाई दी।
    कबीर ने उसके मुंह के आगे घास रख दी और दूध के लिए बर्तन लेकर वहीं खड़े हो गए। बहुत देर होने के बाद भी जब कबीर दूध लेकर नहीं पहुंचे तो रामानंदजी उन्हें ढूंढने के लिए निकले। रास्ते में उन्हें मृत गाय के पास कबीरदास खड़े दिखाई दिए। यह देख रामानंदजी ने उनसे पूछा- तुम यहां क्यों खड़े हो? कबीरदास बोले- यह गाय न तो घास चर रही है और न ही दूध दे रही है।
    इतना सुनकर रामानंदजी ने कबीरदास के सिर पर हाथ रखते हुए कहा- पुत्र। मृत गाय भी कहीं घास चरकर दूध दे सकती है? कबीरदास ने तुरंत प्रतिप्रश्न किया- तब आपके वह पूर्वज जो वर्षों पूर्व मृत हो चुके हैं, वो श्राद्ध का भोजन कैसे कर सकते हैं? रामानंदजी अपने शिष्य की तर्कपूर्ण बात सुनकर मौन हो गए और उन्हें हदय से लगा लिया।

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    कबीर ने भिखारी को दिखाया सही रास्ता
    एक बार दोपहर में जब कबीर कपड़े बुन रहे थे। उनके पास एक भिखारी आया। कबीर के पास उसे देने के लिए कुछ नहीं था। कुछ सोचकर कबीर ने उससे कहा कि- तुम मेरा ये ऊन का गोला ले जाओ और इसे बेचकर अपने लिए भोजन का इंतजाम कर लेना। भिखारी ऊन का गोला लेकर चला गया। रास्ते में उसे एक तालाब दिखा, भिखारी ने ऊन का गोले से जाल बनाया और तालाब से मछली पकड़ने की कोशिश करने लगा। संयोग से उस जाल में काफी सारी मछलियां फंस गईं। भिखारी ने मछलियां बाजार में बेच दी।
    भिखारी रोज यही काम करने लगा। इस तरह वो भिखारी बहुत अमीर आदमी बन गया। एक दिन वह कबीर से मिलने गया और उन्हें पूरी बात बताई। उसकी पूरी बात सुनकर संत कबीर बड़े दुःखी हुए और बोले कि- तुमने इतनी सारी मछलियों से उनका जीवन छीनकर पाप किया है और क्योंकि ये सब मेरे कारण हुआ है इसलिए तुम्हारे आधे पाप का भागीदार मैं भी बन गया हूं। कबीर की बात सुनकर उस व्यक्ति को भी दुख हुआ और उसने आगे ऐसा न करने का वचन दिया।

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    जब कबीर ने ली साधकों की परीक्षा
    एक बार कबीर को लगने लगा की उनके पास साधक कम और सांसारिक इच्छा की पूर्ति करनेवाले लोग अधिक आने लगे हैं। तब एक दिन कबीर उन सभी के सामने एक वैश्या के घर चले गए। लोगों ने जब ये देखा तो कानाफूसी करने लगे और कबीर के चरित्र पर शंका करने लगे। कुछ देर बाद वे सब वहां से चले गए। एक घंटे बाद जब कबीर लौटे तो उन्होंने देखा की पूरा मैदान खाली है और सिर्फ कुछ लोग ही वहां बैठे हैं।
    कबीर को सामने देख वे लोग उनके पैर छूने लगे। तब कबीरदास बोले कि- तुमने देखा नहीं मैं अभी कहां गया था? तब एक भक्त ने कहा कि- उस वैश्य ने जरूर ही कुछ पुण्य किए होंगे जो आपकी चरण धूलि उसके आँगन तक पहुंच गयी। कबीरदास मुस्कुराए और बोले- मैं अपने साधकों की परीक्षा ले रहा था, इसमें तुम कुछ ही लोग सफल हुए हो। इसके बाद कबीरदास ने उन उन लोगों को ज्ञान दिया।

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