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1 नहीं 2 बार खेला था पांडवों ने कौरवों के साथ जुआं, पहली बार हुआ द्रौपदी का चीरहरण और दूसरी बार मिला वनवास

महाभारत के अनुसार, पांडवों ने 1 नहीं बल्कि 2 बार कौरवों के साथ जुआं खेला था।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Jul 10, 2018, 11:17 AM IST

1 नहीं 2 बार खेला था पांडवों ने कौरवों के साथ जुआं, पहली बार हुआ द्रौपदी का चीरहरण और दूसरी बार मिला वनवास

रिलिजन डेस्क.महाभारत की कथा जितनी अनोखी है, उतनी ही विचित्र है। ये बात तो सभी जानते हैं कि पांडवों ने कौरवों के साथ जुआं खेला था, जिसमें वो सबकुछ हार गए थे और इस कारण उन्हें वनवास पर जाना पड़ा था। मगर ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि पांडवों ने एक बार नहीं बल्कि दो बार कौरवों से जुआं खेला था। पहली बार जुएं में हारने पर द्रौपदी का चीरहरण हुआ था और दूसरी बार हारने पर पांडवों को 12 साल के लिए वनवास पर जाना पड़ा था। जानिए क्या है पूरा प्रसंग...

विदुर नहीं चाहते थे कौरव और पांडवों के बीच हो जुआं
- महाभारत के सभापर्व के अनुसार, जब युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया तो दुर्योधन के मन में पांडवों के प्रति जलन होने लगी।
- तब शकुनि ने दुर्योधन से कहा कि तुम राजा धृतराष्ट्र से कहकर पांडवों को जुआं खेलने के लिए हस्तिनापुर बुलाओ। यहां मैं जुएं में उनसे सब-कुछ जीत लूंगा।
- शकुनि के कहने पर दुर्योधन ने ऐसा ही किया। धृतराष्ट्र ने भी दुर्योधन की बात मान ली और विदुर से कहा कि वह इंद्रप्रस्थ जाकर पांडवों को जुआं खेलने के लिए आमंत्रित करे।
- विदुर दुर्योधन की चाल समझ चुके थे, इसलिए उन्होंने इसका विरोध किया, लेकिन धृतराष्ट्र के आदेश पर उन्हें इंद्रप्रस्थ जाना पड़ा।
युधिष्ठिर भी नहीं खेलना चाहते थे जुआं
- जब विदुरजी ने युधिष्ठिर के सामने कौरवों के साथ जुआं खेलने के प्रस्ताव रखा तो युधिष्ठिर ने कहा कि जुआ तो अधर्म की जड़ है।
- लेकिन महाराज धृतराष्ट्र की आज्ञा मानना मेरा धर्म है इसलिए हम सभी भाई जुआ खेलने हस्तिनापुर अवश्य आएंगे।
- जब युधिष्ठिर हस्तिनापुर कौरवों के साथ जुआ खेलने पहुंचे तो दुर्योधन ने कहा कि दांव लगाने के लिए धन मैं दूंगा, लेकिन मेरी ओर से मेरे मामा शकुनि खेलेंगे।
जब अपना सब-कुछ हार गए युधिष्ठिर
- शकुनि जुआं खेलने में माहिर था, देखते ही देखते उसने युधिष्ठिर से उनका धन, महल भूमि सब-कुछ जीत लिया।
- इसके बाद युधिष्ठिर ने नकुल, सहदेव, अर्जुन, भीम और स्वयं को भी दांव पर लगाया। शकुनि ने यह सभी दांव भी जीत लिए।
- अंत में युधिष्ठिर ने द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया। शकुनि ने ये दांव भी जीत लिया।
- इसके बाद दुर्योधन के कहने पर दु:शासन द्रौपदी के बाल पकड़कर घसीटते हुए सभा में ले आया। यह देखकर पांडवों को बहुत दु:ख हुआ।
द्रौपदी के चीरहरण के बाद हुए थे भयानक अपशकुन
- इसके बाद कर्ण के कहने पर दु:शासन बलपूर्वक द्रौपदी के वस्त्र उतारने लगा, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से ऐसा हो न सका।
- ये दृश्य देख भीम बहुत गुस्सा हो गए और उन्होंने भरी सभा में दु:शासन की छाती का खून पीने की प्रतिज्ञा की।
- भीम की प्रतिज्ञा सुनकर सभी में उपस्थित सभी लोग डर गए। इसके बाद दुर्योधन ने द्रौपदी को अपनी बाईं जांघ पर बैठने के लिए कहा।
- गुस्से में भीम ने युद्ध में दुर्योधन की जांघ तोड़ने की भी प्रतिज्ञा की। जब ये घटनाक्रम चल रहा था।
- उस समय धृतराष्ट्र की यज्ञशाला में बहुत से गीदड़ इकट्ठे होकर रोने लगे और गधे रेंकने लगे। ये अपशकुन देखकर गांधारी डर गई।
जब धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर को लौटा दिया उनका राज्य
- जब गांधारी और विदुर ने इन अपशकुनों के बारे में धृतराष्ट्र को बताया तो वह भी डर गए और किसी अनहोनी से डरकर उन्होंने द्रौपदी से वरदान मांगने को कहा।
- द्रौपदी ने अपने पांचों पति तो दुर्योधन के दासत्व से मुक्त करवा लिया और राज्य भी वापस ले लिया।
- इसके बाद धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर से कहा कि तुम तुम मेरे पुत्रों को क्षमा कर दो। मुझे और माता गांधारी की ओर देखकर दुर्योधन की गलती भूल जाओ।
- धृतराष्ट्र के कहने पर ही युधिष्ठिर सभी को साथ लेकर इंद्रप्रस्थ चले गए। यह देखकर दुर्योधन को बहुत गुस्सा आया।
- उसने धृतराष्ट्र से कहा कि पांडव हमें कभी क्षमा नहीं करेंगे। इसलिए वनवास की शर्त पर पांडवों के साथ फिर से जुआ खेलेंगे।
- जुए में जो भी हारेगा वह 12 वर्ष तक वन में रहेगा और तेरहवें वर्ष अज्ञातवास में छिपकर रहेगा।
जब पांडवों और कौरवों ने दोबारा खेला जुआं
- धृतराष्ट्र ने दुर्योधन की यह बात मान ली और पांडवों को दोबारा जुआं खेलने के लिए हस्तिनापुर बुलाया। पांडव अभी रास्ते में ही थे।
- धृतराष्ट्र की बात मानकर युधिष्ठिर फिर जुआ खेलने के लिए राजी हो गए और हस्तिनापुर आ गए।
- वनवास की पूरी बातें जानने के बाद युधिष्ठिर एक बार फिर शकुनि से जुआ खेलने बैठे और यह दांव भी हार गए।
- पितामाह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कुलगुरु कृपाचार्य व महाराज धृतराष्ट्र से आज्ञा लेकर पांडव वन की ओर चल दिए।
- शर्त के अनुसार, पांडवों को 12 साल वनवास और 1 साल अज्ञातवास में रहना पड़ा।

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