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हज यात्रा में पूरी करनी पड़ती हैं ये परंपराएं, पहने जाते हैं बिना सीले कपड़े

इस्लाम में रोजा रखना हर मुसलमान के लिए जरूरी बताया गया है।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Jun 12, 2018, 05:00 PM IST

  • हज यात्रा में पूरी करनी पड़ती हैं ये परंपराएं, पहने जाते हैं बिना सीले कपड़े

    रिलिजन डेस्क। इस्लाम धर्म में पवित्र रमजान माह के दौरान रोजा रखने की परंपरा है। इस्लाम में रोजा रखना हर मुसलमान के लिए जरूरी बताया गया है। इसके अलावा भी कुछ काम मुसलमानों के लिए बहुत जरूरी माने गए हैं जैसे- कलमा और नमाज पढ़ना, जकात यानी दान देना और जीवन में एक बार हज पर जाना।


    काबा है मुस्लिमों का सबसे बड़ा तीर्थ
    मुस्लिमों का सबसे बड़ा धर्म स्थल यानी काबा सऊदी अरब के मक्का में है। मुसलमान हज के लिए यहां आते हैं। काबा का अर्थ है खुदा का घर। काबा बहुत बड़ी मस्जिद में स्थित एक छोटी सी इमारत है। जो संगमरमर से बनी है। मान्यता है कि यह जन्नत से इंसान के साथ जमीन पर आया है। जब इब्राहिम काबा का निर्माण कर रहे थे तब जिब्राइल, जिसे देवदूत माना जाता है ने उनको यह पत्थर दिया। इस प्रकार इस स्थान की पवित्रता के कारण ही कोई भी विश्व में मुसलमान किसी भी स्थान पर हो, लेकिन वह नमाज काबा की तरफ मुंह करके ही पढ़ता है।


    कैसे होती है हज यात्रा?
    -हज यात्रा विभिन्न चरणों में पूरी होती है। इसकी शुरुआत इस्लामी कैलेंडर के माह जिलहज से होती है। सभी हज यात्रियों को मक्का पहुंचने से पहले मीकात नाम की सीमा से गुजरना होता है।
    - इस सीमा में प्रवेश करने के लिए एहराम नाम का विशेष वस्त्र पहनना जरूरी होता है। यह बिना सीले चादर के दो टुकड़े होते हैं। जिनमें से एक को शरीर के निचले भाग में लुंगी बनाकर व दूसरे को कंधे पर लपेटा जाता है।
    - यह वस्त्र पहनने के बाद किसी प्राणी या पेड़-पौधे के प्रति हिंसा नहीं की जाती, बाल नहीं काटे जाते आदि नियमों का पालन आवश्यक हो जाता है।
    - इसके बाद अगले चरण में तवाफ की रस्म पूरी की जाती है। जिसमें हजयात्री काबा के पवित्र स्थान के चारों ओर अपनी शक्ति के अनुसार चक्कर लगाते हैं। सात चक्कर लगाने को एक तवाफ कहते हैं।
    - तवाफ के बाद सईअ अर्थात् सफा-मरवाह नाम के दो रेगिस्तानी पहाड़ों पर दौड़ने की रस्म पूरी की जाती है। यहीं पर हज यात्री आबे-जम-जम नाम के पवित्र जल को पीते हैं।
    - हज यात्रा की महत्वपूर्ण रस्मों में शैतान को पत्थर मारना भी आवश्यक है। हज यात्री मीना और मजदलफा में ठहरकर वापस लौटते समय अपने साथ लाए गए पत्थरों को शैतान के स्थान पर फेंकते हैैं। इस तरह हज यात्रा पूरी की जाती है।

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