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100 साल पुराना है कुत्ते का मंदिर, पैर में धागा बांधकर करते हैं मन्नत

आज हम आपको कुछ ऐसे मंदिरों के बारे में बता रहे हैं, जहां भगवान की नहीं बल्कि जानवरों की पूजा की जाती है।

dainikbhaskar.com | Last Modified - May 26, 2018, 07:30 PM IST

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    चित्र: सिकंदराबाद स्थित कुत्ते का मंदिर

    रिलिजन डेस्क।अभी तक आपने भगवान के मंदिरों और उनसे जुड़ी अजीबोगरीब परंपराओं के बारे में सुना होगा। लेकिन आज हम आपको कुछ ऐसे मंदिरों के बारे में बता रहे हैं, जहां भगवान की नहीं बल्कि जानवरों की पूजा की जाती है। जानिए कहां ये मंदिर...

    यहां होती है कुत्ते की कब्र की पूजा
    हिंदू धर्म में कुत्तों को भैरव का वाहन मानकर इनकी पूजा की जाती है तो शनि दोष से बचने के लिए इन्हें रोटी खिलाई जाती है। लेकिन भारत में एक जगह ऐसी भी है जहां कुत्ते का मंदिर है और लोग यहां आकर श्रद्धा और भक्ति से सिर झुकाते हैं। यह मंदिर बुलंदशहर से करीब 15 किलोमीटर दूर औद्योगिक क्षेत्र सिकंदराबाद में है। मंदिर करीब 100 साल पुराना बताया जाता है। यहां कुत्ते की कब्र की पूजा की जाती है। मान्यता है कि कुत्ते के पैर में काला धागा बांधने से हर इच्छा पूरी होती है।

    यहां बिल्ली को मानते हैं देवी का स्वरूप
    अभी तक आपने बिल्ली से जुड़े शकुन-अपशकुन के बारे में सुना होगा, लेकिन कर्नाटक में एक मंदिर ऐसा भी है जहां बिल्ली की पूजा की जाती है। ये मंदिर कर्नाटक के मांड्या जिले के बेक्कालेले गांव में है। इस गांव का नाम भी कन्नड़ के बेक्कू शब्द पर पड़ा है, जिसका मतलब बिल्ली होता है। इस गांव में बिल्लियों की पूजा की परंपरा करीब 1000 साल पुरानी थी। मान्यता है कि उनकी देवी मनगम्मा ने बिल्ली के रूप में गांव में प्रवेश किया था और वह बुरी शक्तियों से गांव की रक्षा करती हैं।

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    चित्र: करणी माता मंदिर

    इस मंदिर में हैं हजारों चूहें
    राजस्थान के बीकानेर में करणी माता का मंदिर है। इस मंदिर में करीब 20 हजार चूहें हैं। यहां माता को प्रसाद चढ़ाने के साथ ही चूहों के लिए भी प्रसाद रखा जाता है। मान्यता है कि करणी देवी साक्षात मां जगदम्बा का अवतार थीं। जिस स्थान पर यह मंदिर बना है, वहां अब से लगभग साढ़े छह सौ वर्ष पूर्व एक गुफा में रहकर मां अपने इष्ट देव की पूजा-अर्चना किया करती थीं। यह गुफा आज भी मंदिर परिसर में स्थित है।

    यहां होती है चमगादड़ की पूजा
    बिहार के वैशाली जिले के राजापाकर प्रखंड के सरसई गांव में लोग चमगादड़ को संपन्नता का प्रतीक मानते हैं। यहां ये मान्यता है कि जहां चमगाड़ होते हैं, वहां कभी पैसे की कमी नहीं होती। शगुन संबंधी हर काम में गांव वाले चमगादड़ों की पूजा करना नहीं भूलते।

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