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देवशयनी एकादशी 23 जुलाई को : इस दिन व्रत करने से पापों का होता है नाश, 4 महीनों तक नहीं होते शुभ कार्य

देवशयनी एकादशी को हरिशयनी एकादशी, पद्मनाभा तथा प्रबोधनी के नाम से भी जाना जाता है।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Jul 23, 2018, 03:12 PM IST

देवशयनी एकादशी 23 जुलाई को : इस दिन व्रत करने से पापों का होता है नाश, 4 महीनों तक नहीं होते शुभ कार्य

डिजिटल डेस्क. आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस साल ये एकादशी 23 जुलाई को पड़ रही है। देवशयनी एकादशी को हरिशयनी एकादशी, पद्मनाभा तथा प्रबोधनी के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत को करने से पापों का नाश होता है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। देवशयनी एकादशी की रात से भगवान का शयन काल शुरू हो जाता है। जो 4 महीनों तक चलता है। जिसे हम चातुर्मास कहते हैं। इन दौरान सावन, भादो, अश्व‍िन और कार्तिक का म‍हीना आएगा।
पौराणिक महत्व
- पुराणों के अनुसार इस दिन से भगवान श्री विष्णु 4 महीनों से लिए पाताल लोक में रहने के लिए चले जाते हैं।
- कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से विष्णु भगवान उस लोक के लिए गमन करते हैं।
- इसके बाद 4 महीने के बाद सूर्य के तुला राशि में प्रवेश करते हैं।
- इस दिन ही विष्णु भगवान का शयन काल खत्म होता है इस दिन को देवउठनी एकादशी कहा जाता है। जो इस साल 19 नवंबर को है।
- इन 4 महीनों में कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किया जाता है।
देवशयनी एकादशी पूजा विधि
- देवशयनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठें। इसके बाद घर की साफ-सफाई करें तथा नित्य कर्म से निवृत्त हो जाएं। स्नान कर पवित्र जल का घर में छिड़काव करें।
- घर के पूजन स्थल अथवा किसी भी पवित्र स्थल पर प्रभु श्री हरि विष्णु की सोने, चाँदी, तांबे अथवा पीतल की मूर्ति की स्थापना करें।
- इसके बाद उसका षोड्शोपचार सहित पूजन करें। इसके बाद भगवान विष्णु को पीतांबर(पीला कपड़ा) आदि से विभूषित करें। इसके बाद व्रत कथा सुनें।
- इसके बाद आरती कर प्रसाद वितरण करें। अपने सामथ्र्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराएं तथा दक्षिणा देकर विदा करें।
- अंत में सफेद चादर से ढँके गद्दे-तकिए वाले पलंग पर श्री विष्णु को शयन कराएं तथा स्वयं धरती पर सोएं।
- धर्म शास्त्रों के अनुसार यदि व्रती(व्रत रखने वाला) चातुर्मास नियमों का पालन करें तो उसे देवशयनी एकादशी व्रत का संपूर्ण फल मिलता है।
पौराणिक कथा के अनुसार महत्व
- सूर्यवंशी मान्धाता नाम का एक सत्यवादी और प्रतापी राजा था। एक बार उसके राज्य में अकाल पड़ा।
- इससे निपटने का उपाय ढूंढने के लिए जंगल की ओर चल दिए घूमते-घूमते वे ब्रह्मा के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचे।
- राजा ने उनको अकाल के बारे में बताया इस पर ऋषि ने उन्हें देव शयनी एकादशी व्रत करने को कहा।
- राजा ने एकादशी व्रत का पालन किया और इससे उनके राज्य को अकाल से मुक्ति मिल गई।
4 महीने भगवान शिव करते हैं सृष्टि का संचालन
- शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु इस एकादशी से चार माह तक क्षीर सागर में विश्राम करते हैं।
- इस दौरान भगवान शिव सृष्टि का संचालन करते हैं।

चार महीने के लिए क्यों सो जाते हैं भगवान
- वामन पुराण के मुताबिक असुरों के राजा बलि ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था।
- इससे भयभीत होकर देवताओं ने भगवान विष्‍णु से मदद मांगी।
- तब भगवान विष्‍णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए।
- वामन भगवान ने बलि से तीन पग भूमि मांगी। पहले और दूसरे पग में भगवान ने धरती और आकाश को नाप लिया।
- अब तीसरा पग रखने के लिए कुछ बचा नहीं थी तो राजा बलि ने कहा कि तीसरा पग उनके सिर पर रख दें।
- तब भगवान ने ऐसा ही किया। भगवान राजा बलि से प्रसन्‍न हुए और उन्‍होंने राजा बलि से वरदान मांगने को कहा।
- तो बलि ने उनसे पाताल में बसने की प्रार्थना की. बलि की इच्‍छा पूर्ति के लिए भगवान को पाताल जाना पड़ा।
- भगवान विष्‍णु के पाताल जाने के बाद सभी देवतागण और माता लक्ष्‍मी चिंतित हो गए।
- अपने पति भगवान विष्‍णु को वापस लाने के लिए माता लक्ष्‍मी गरीब स्‍त्री बनकर राजा बलि के पास पहुंची और उन्‍हें अपना भाई बनाकर राखी बांध दी।
- बदले में भगवान विष्‍णु को पाताल लोक से वापस ले जाने का वचन ले लिया।
-पाताल से विदा लेते वक्‍त भगवान विष्‍णु ने राजा बलि को वरदान दिया।
- जिसके अनुसार वह आषाढ़ शुक्‍ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्‍ल पक्ष की एकादशी (देवउठनी एकादशी) तक पाताल लोक में रहेंगे। इस अवधि को योगनिद्रा माना जाता है।

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