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बुद्ध की 1 बात का अलग-अलग मतलब निकाला संन्यासी, चोर और वेश्या ने

इस बार 30 अप्रैल, सोमवार को बुद्ध पूर्णिमा है। मान्यता के अनुसार इसी दिन महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था था।

Dainikbhaskar.com | Last Modified - Apr 30, 2018, 02:40 PM IST

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    रिलिजन डेस्क। इस बार 30 अप्रैल, सोमवार को बुद्ध पूर्णिमा है। मान्यता के अनुसार इसी दिन महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था था। इस मौके पर हम आपको महात्मा बुद्ध के जीवन से जुड़ी कुछ घटनाओं के बारे में बता रहे हैं-

    सबकी अपनी-अपनी समझ
    बुद्ध की आदत थी की वे हर बात अपने शिष्यों को तीन बार समझाते थे। आनंद ने बुद्ध से एक दिन पूछा ही लिया कि- आप एक ही बात को तीन बार क्यों दोहराते हैं? आनंद को समझाने के लिए बुद्ध ने कहा कि- आज की सभा में संन्यासियों के अलावा एक वेश्या और एक चोर भी थे। कल सुबह तुम इन तीनों (संन्यासी, वेश्या और चोर) से जाकर पूछना की कल सभा में बुद्ध ने जो आखिरी वचन कहे उनसे वो क्या समझे?
    सुबह होते ही आनंद ने जो पहला संन्यासी दिखा उससे पूछा कि- कल रात बुद्ध ने जो आखिरी वचन कहे थे कि अपना-अपना काम करो, उन शब्दों से आपने क्या समझा? भिक्षु बोला- हमारा नित्य कर्म है की सोने से पहले ध्यान करो। आनंद को इसी उत्तर की अपेक्षा थी। अब वो अब तेजी से नगर की ओर चल दिया।
    आनंद सीधे चोर के घर पहुंचा और उससे भी वही सवाल पूछा। चोर ने कहा कि- मेरा काम तो चोरी करना है। कल रात मैंने इतना तगड़ा हाथ मारा की अब मुझे चोरी नहीं करनी पड़ेगी। आनंद को बड़ा आश्चर्य हुआ और वो वहां से वेश्या के घर की तरफ चल दिया।
    वेश्या के घर पहुंचते ही आनंद ने वही सवाल पूछा। वेश्या ने कहा कि- मेरा काम तो नाचना गाना है। कल भी मैंने वही किया। आनंद आश्चर्यचकित हो कर वहां से लौट गया। आनंद ने पूरी बात जाकर बुद्ध को बताई। बुद्ध बोले- इस संसार में जितने जीव हैं उतने ही दिमाग हैं। बात तो एक ही होती है पर हर आदमी अपनी समझ से उसके मतलब निकाल लेता है। इसका कोई उपाय नही है। ये सृष्टि ही ऐसी है।

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    विपरीत परिस्थिति में भी धैर्य से काम लें
    एक बार गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। प्यास लगने पर उन्होंने अपने एक शिष्य को पानी लेने के लिए भेजा। शिष्य को थोड़ी दूर पर एक तालाब दिखाई दिया, लेकिन वो पानी ले न सका क्योंकि पानी गंदा था और खाली हाथ वापस आ गया। उसने यह पूरी बात बुद्ध को बताई। इसके बाद बुद्ध ने अपने दूसरे शिष्य को भेजा।
    कुछ देर बाद दूसरा शिष्य पानी ले आया। तब बुद्ध ने उससे पूछा कि- पानी तो गन्दा था फिर भी तुम स्वच्छ जल कैसे ले आए। शिष्य ने बताया कि– तालाब का पानी सचमुच गंदा था, लेकिन लोगों के जाने के बाद मैंने कुछ देर इंतजार किया। मिट्टी नीचे बैठने के बाद साफ पानी ऊपर आ गया और मैं ले आया।
    बुद्ध यह सुनकर प्रसन्न हुए और बाकी शिष्यों को भी सीख दी और बोले– हमारा जीवन भी पानी की तरह है क्योंकि जब तक हमारे कर्म अच्छे हैं तब तक सब कुछ शुद्ध है, लेकिन जीवन में कई बार दुःख और समस्या भी आती हैं, जिससे जीवन रूपी पानी गंदा लगने लगता है। कुछ लोग पहले वाले शिष्य की तरह बुराई को देखकर घबरा जाते हैं और मुसीबत देखकर वापस लौट जाते हैं। वो जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाते।
    वही दूसरी ओर जो कुछ लोग जो धैर्यशील होते हैं वो व्याकुल नहीं होते और कुछ समय बाद अपने आप ही दुःख समस्याए समाप्त हो जाती हैं। इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि– समस्या और बुराई कुछ समय के लिए ही जीवन रूपी पानी को गंदा कर सकती है, लेकिन अगर धैर्य से काम लेंगे तो बुराई खुद अपने आप ही समाप्त हो जाएगी।

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