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मान्यता: यहां निवास करती है साक्षात मां काली, तांत्रिक क्रियाओं के लिए है प्रसिद्ध

कोलकाता के 2 प्रसिद्ध काली मंदिर, यहां दिन-रात होती है तांत्रिक क्रियाएं

यूटीलिटी डेस्क | Last Modified - Jan 05, 2018, 05:00 PM IST

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    दक्षिणेश्वर काली मंदिर

    पूरे विश्व में देवी भगवती के अलग-अलग रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में मुख्य रूप से मां काली की आराधना की जाती है। धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, कोलकाता में मां काली खुद निवास करती हैं और उन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम कोलकाता पड़ा।

    ग्रंथों में दिए गए वर्णन के अनुसार, कोलकाता के प्रसिद्ध मंदिर दक्षिणेश्वर से लेकर बाहुलापुर (वर्तमान में बेहाला) तक की भूमि तीर-कमान के आकार की है। आइए अब अपको कोलकाता के 2 प्रसिद्ध काली मंदिरों के बारे में बताते हैं-

    1. दक्षिणेश्वर काली मंदिर

    हुगली नदी के तट पर बसा यह काली मंदिर माता के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। कहते हैं इस जगह पर माता सती के दायें पैर की चार उंगलियां गिरी थीं। दक्षिणेश्वर काली मंदिर को काली का दिव्य धाम भी कहा जाता है। कलियुग में भक्तों के लिए यह जगह किसी सिद्ध स्थान से कम नहीं है। दक्षिणेश्वर काली मंदिर की गणना न सिर्फ बंगाल बल्कि पूरे भारत के महानतम देवी तीर्थों में की जाती है।

    मंदिर निर्माण की कथा

    कहा जाता है कि एक समय पर यहां रासमणि नाम की रानी थी। रानी मां काली की बड़ी भक्त थी। वह हर साल समुद्र के रास्ते से होते हुए काशी के काली मंदिर में पूजा-अर्चना करने जाती थी। एक बार रानी अपने संबंधियों और नौकरों के साथ काली मंदिर जाने की तैयारियां कर रहीं थी। तभी एक रात उन्हें सपने में मां काली ने दर्शन दिए और इसी जगह पर मां का मंदिर बनवाने और उसमें ही मां की सेवा करने के आदेश दिया। देवी के आदेश पर रानी ने वर्ष 1847 में यहां मंदिर बनवाना शुरु किया, जो की वर्ष 1855 तक पूरा हो गया।

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    दक्षिणेश्वर काली मंदिर

    यहां मां काली को कहा जाता है भवतारिनी

    रानी के द्वारा बनवाया गया दक्षिणेश्वर काली मंदिर बहुत ही भव्य और वास्तुकला का सुंदर उदाहरण है। यह दो मंजिला मंदिर है और नौ गुंबदों पर बना हुआ है। इस गुंबदों पर खड़े लगभग सौ फीट ऊंचे मंदिर के गर्भगृह में मां काली की सुंदर मूर्ति है, जिसे भवतारिनी के नाम से जाना जाता है।भवतारिनी काली मां की मूर्ति लेटे हुए भगवान शिव की छाती पर खड़ी है।

    यहीं पाई थी श्रीरामकृष्ण परमहंस ने सिद्धि

    कहा जाता है कि दक्षिणेश्वरी काली मां श्रीरामकृष्ण परमहंस की ईष्टदेवी थीं। इसी मंदिर में मां काली की आराधना करके उन्होंने सिद्धि हासिल की थी। मंदिर परिसर में ही परमहंसदेव का कमरा भी है, जिसमें उनके पलंग आदि को उनके स्मृतिचिन्हों के रूप में सुरक्षित रखा गया है। मंदिर के बाहर उनकी पत्नी श्री शारदा देवी और रानी रासमणि की समाधि भी है। साथ ही एक वटवृक्ष भी है, जिसके नीचे बैठकर परमहंसजी ध्यान किया करते थे।

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    कालीघाट मंदिर

    कालीघाट मंदिर

    कोलकाता में काली मां का एक और सिद्ध मंदिर है। कोलकाता के गऊ बाजार में बने इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण डोम नाम के एक व्यक्ति ने किया था, जो लोगों की चेचक की बीमारी का इलाज किया करता था। इस मंदिर में रखी शिलालेख बताता है ति इसका निर्माण वर्ष 1498 में किया गया था।

    कहते है कि इस मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति स्थापित की गई थी, लेकिन 18 वी शताब्दी में एंटोनी नाम के एक फिरंगी ने यहां के पंचमुखी आसन पर मां काली की मूर्ति स्थापित कर दी। मान्यता है कि प्रमुख जगह पर आज भी भगवान शिव की मूर्ति है, जबकि मां काली की मूर्ति एक किनारे पर स्थित है। यहां की काली प्रतिमा मुख काले पत्थरों से निर्मित है। जिह्वा, हाथ और दांत सोने से मढ़े हुए हैं।

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    कालीघाट मंदिर

    कालीघाट मंदिर के आस-पास घूमने की जगह

    कालीघाट मंदिर के पास ही भगवान शिव के बारह मंदिरों की श्रृंखला है। जिसमें मंदिर, स्नान घाट आदि शामिल हैं। मंदिर के पास ही यहां की प्रसिद्ध हुगली नदी है। यहां के गार्डन रीच नाम की जगह पर बने काली मंदिर की मूर्ति लगभग 800 साल पुरानी कही जाती है, जो नदी के पानी में तैरती हुई पाई गई थी। कोलकाता के टांगरा का चाईनीज काली मंदिर भी यहां के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है।

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Web Title: Importance Of Kali Temples In Kolkata
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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