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बरसाना में क्यों मनाई जाती है लट्ठमार होली, अधिकतर लोग नहीं जानते हैं ये कारण

अगर आप होली पर कहीं घूमने जाना चाहते हैं तो बरसाना जा सकते हैं। यहां की लट्ठमार होली दुनियाभर में प्रसिद्ध है।

यूटिलिटी डेस्क | Last Modified - Feb 28, 2018, 05:00 PM IST

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    गुरुवार, 1 मार्च की रात होलिका दहन होगा और अगले दिन यानी 2 मार्च को होली खेली जाएगी। होली रंगों का त्योहार है और भारत के अधिकतर हिस्सों में रंगों से ही होली खेली जाती है, लेकिन मथुरा के पास बरसाना की होली सबसे निराली होती है। बरसाना में लट्ठमार होली खेली जाती है जो कि देश-विदेश में बहुत प्रसिद्ध है। होली पर बरसाना में बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। यहां जानिए बरसाना की लट्ठमार होली से जुड़ी खास बातें…

    राधा का जन्म स्थान है बरसाना

    मथुरा के पास ही बरसाना है, जिसे राधाजी का जन्म स्थान मानते हैं। होली पर नंदगांव के लोग होली खेलने के लिए बरसाना आते हैं। ऐसी मान्यता है कि सबसे पहले होली भगवान श्रीकृष्ण ने राधाजी के साथ होली खेली थी। इसलिए इस पूरे क्षेत्र में होली बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाती है।

    इसलिए कहते हैं नंदगांव

    यहां प्रचलित मान्यता के अनुसार नंदगांव भगवान श्रीकृष्ण के पिता नंदराय ने बसाया था। इसी कारण इस गांव का नाम नंदगांव पड़ा है। गोकुल को छोड़कर नंदबाबा श्रीकृष्ण और सभी गांव वालों को लेकर नंदगांव आ गए थे।

    लट्ठमार होली क्यों मनाते हैं?

    राधा की जन्म भूमि बरसाना में यहां फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की नवमी पर नंदगांव के लोग होली खेलने के लिए आते है। बरसाने की महिलाएं इनसे लट्ठमार होली खेलती हैं और दशमी पर रंगों से होली खेली जाती है। इस परंपरा के बारे में कहा जाता है कि श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाना होली खेलने आते थे। होली की मस्ती में राधा अपनी सखियों के श्रीकृष्ण और उनके साथियों पर डंडे बरसाती थीं। तभी से बरसाना में लट्ठमार होली की परंपरा चली आ रही है।

    और कहां-कहां खेली जाती है लट्ठमार होली

    बरसाना के साथ ही मथुरा, वृंदावन, नंदगांव में भी इसी प्रकार परंपरागत होली खेली जाती है। होली की मस्ती महिलाएं हाथ में लाठियां लेकर पुरुषों को पीटना शुरू कर देती हैं और पुरुष खुद को बचाने के लिए इधर-उधर भागते हैं। ये सब मारना-पीटना हंसी-खुशी में होता है।

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