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भगवान के सामने प्रार्थना के ये हैं 6 नियम, रखेंगे ध्यान तो सुनी जाएगी हर मन्नत

प्रार्थना क्या है...किसी से किया गया निवेदन। वैसे तो प्रार्थना के कई अर्थ हैं, व्याकरण कहता है निवेदन पूर्वक मांगना यानी

यूटीलिटी डेस्क | Last Modified - Jan 29, 2018, 06:13 PM IST

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    प्रार्थना क्या है...किसी से किया गया निवेदन। वैसे तो प्रार्थना के कई अर्थ हैं, व्याकरण कहता है निवेदन पूर्वक मांगना यानी प्रार्थना। अध्यात्म कहता है परम की कामना करना या पवित्र मन से अर्चन करना। जब संसार के समक्ष झुक कर हम कुछ मांगते हैं तो वो प्रार्थना नहीं, सहज निवेदन होता है। लेकिन, जब यही निवेदन संसार से परे, परमात्मा को मनाने के लिए हो तो वो प्रार्थना बन जाता है। व्याकरण और ग्रंथों ने प्रार्थना के कई अर्थ बताए हैं, प्रार्थना यानी पवित्रता के साथ किया गया अर्चन। प्रार्थना का एक अर्थ परम की कामना भी है।

    लोग भगवान से मन्नत भी मांगते हैं। कभी प्रसाद चढ़ाने की, कभी धन चढ़ाने की तो कभी कोई व्रत की। बहुत अंतर है, प्रार्थना और मन्नत में। मन्नत उससे कुछ पाने के लिए की जाती है, प्रार्थना उसको ही पाने के लिए होती है। सिर्फ मंत्रों से, हाथ जोड़कर बैठ जाने से, मंदिर और मूर्तियों की परिक्रमा से या किलोभर प्रसाद बांट देने से प्रार्थना नहीं होती, प्रार्थना तब होती है, जब हम मन से बोलते हैं। भगवान को लालच सिर्फ आपका है, भक्त उसके लिए महत्वपूर्ण है, प्रसाद और चढ़ावा नहीं।

    जब सारी वासनाओं से उठकर जब हम सिर्फ उस परमानंद को पाने की मन से चेष्टा करते हैं, प्रार्थना हमारे भीतर गूंजने लगती है। प्रार्थना, मंत्रों का उच्चारण मात्र नहीं है, मन की आवाज है, जो परमात्मा तक पहुंचनी है। अगर मन से नहीं है, तो वो मात्र शब्द और छंद भर हैं। प्रार्थना हृदय से निकलती है। हम अगर उसको मन से नहीं पुकारेंगे, तो आवाज उस तक पहुंचेगी ही नहीं। उस तक बात पहुंचानी है तो मुख बंद कीजिए, हृदय से बोलिए। वो मन की सुनता है, मुख की नहीं।

    प्रार्थना का कोई विकल्प नहीं है। अगर उसको पाना है तो यही मार्ग है। प्रार्थना हम परमात्मा को ही मांगने के लिए करते हैं, उसकी कृपा के लिए करते हैं। उससे कुछ पाने के लिए तो मांगने के कई साधन हैं। लेकिन उसको ही पाना हो तो फिर मन से निकली आवाज ही उसका रास्ता है। क्योंकि, ग्रंथों ने कहा है कि परमात्मा सिर्फ मन से निकली आवाज सुनता है, क्योंकि वो आत्मा की आवाज है, और आत्मा उसका ही अंश है। जब तक भीतर से नहीं पुकारेंगे, वो नहीं सुनेगा।

    प्रार्थना के कुछ नियम है। कुछ ऐसी बातें जो हमें प्रार्थना में ध्यान रखनी चाहिए।

    पहला नियम….

    वासना से परे हो जाएं। संतों ने कहा है वासना जिसका एक नाम “ऐषणा” भी है, तीन तरह की होती है, पुत्रेष्णा, वित्तेषणा और लोकेषणा। संतान की कामना, धन की कामना और ख्याति की कामना।

    जब मनुष्य इन सब से ऊपर उठकर सिर्फ परमतत्व को पाने के लिए परमात्मा के सामने खड़ा होता है, प्रार्थना तभी घटती है। उस परम को पाने की चाह, हमारे भीतर गूंजते हर शब्द को मंत्र बना देती है, वहां मंत्र गौण हो जाते हैं, हर अक्षर मंत्र हो जाता है।

    दूसरा नियम...

    प्रार्थना अकेले में नहीं करनी चाहिए, एकांत में करें। जी हां, अकेलापन नहीं, एकांत हो। दोनों में बड़ा आध्यात्मिक अंतर है। अकेलापन अवसाद को जन्म देता है, क्योंकि इंसान संसार से तो विमुख हुआ है, लेकिन परमात्मा के सम्मुख नहीं गया। एकांत का अर्थ है आप बाहरी आवरण में अकेले हैं, लेकिन भीतर परमात्मा साथ है। संसार से वैराग और परमात्मा से अनुराग, एकांत को जन्म देता है, जब एक का अंत हो जाए. आप अकेले हैं लेकिन भीतर परमात्मा का प्रेम आ गया है तो समझिए आपके जीवन में एकांत आ गया। इसलिए अकेलेपन को पहले एकांत में बदलें, फिर प्रार्थना स्वतः जन्म लेगी।

    तीसरा नियम…

    इसमें परमात्मा से सिर्फ उसी की मांग हो। प्रार्थना सांसारिक सुखों के लिए मंदिरों में अर्जियां लगाने को नहीं कहते, जब परमात्मा से उसी को मांग लिया जाए, अपने जीवन में उसके पदार्पण की मांग हो, वो प्रार्थना है। इसलिए. अगर आप प्रार्थना में सुख मांगते हैं, तो सुख आएगा, लेकिन ईश्वर खुद को आपके जीवन में नहीं उतारेगा। जब आप परमात्मा से उसी को अपने जीवन में उतरने की मांग करेंगे तो उसके साथ सारे सुख “बाय डिफाल्ट” ही आ जाएंगे।

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    चौथा नियम...

    प्रार्थना में अपने लिए परमात्मा को मांगिए लेकिन दूसरों के लिए सुख-शांति की कामना कीजिए। इस तरह की प्रार्थना निःस्वार्थ प्रार्थना कहलाती हैं। कोशिश करें कि कभी-कभी भगवान से किसी ऐसे इंसान के लिए भी कुछ मांगें जो आपसे जुड़ा नहीं है, सीधे लाभ या हानि का कोई संबंध नहीं है। दूसरों के लिए अच्छा मांगें। आपको इससे जो शांति और तृप्ति मिलेगी वो अतुलनीय होगी।

    पांचवा नियम….

    खुद को समय दें। इस दौर में इंसान का सारा समय दूसरों के लिए जा रहा है। अपनेआप को समय देना सीखें। संचार के सारे संसाधनों से दूर दिन में, सप्ताह में या महीने में कुछ समय ऐसा निकालें, जब आप के साथ सिर्फ आप खुद हों। अपने जीवन और उसके पहलुओं पर चिंतन करें, कहां चूक रहे हैं, कितना खप चुके हैं, परमात्मा और आत्मिक शांति के लिए क्या किया है आज तक। ये समय आपने जो अपने साथ बिताया है, ये आपके जीवन को नई दिशा में ले जाएगा।

    छठा नियम…

    खुद को आजमाएं। आपकी प्रार्थना सही दिशा में जा रही है या नहीं इसे आजमाएं। अगर परेशानियों में आपको ये लग रहा है कि आप अकेले नहीं है, कोई है जो आपको रास्ता दिखा रहा है पीछे से, तो परमात्मा आपके साथ हैं। अगर परेशानी में खुद को अकेला और हारा हुआ महसूस करते हैं, बहुत जल्दी घबरा जाते हैं तो समझ लीजिए कि आप अभी भगवान तक अपनी बात पहुंचा ही नहीं पाए हैं। प्रार्थना बिना मांगे सब पाने का नाम है। अगर आप में विपरीत परिस्थितियों में सहज रहने और मुस्कुरा कर सबका सामना करने की शक्ति आ रही है तो आप उससे जुड़ चुके हैं।

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