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30 साल बाद शिवरात्रि पर महासंयोग, 13 और 14 फरवरी को मनेगी

महाशिवरात्रि पर्व इस बार दो दिन 13 और 14 फरवरी को श्रद्धाभाव के साथ मनाया जाएगा। ज्योतिषियों ने बताया कि सनातन धर्म में

यूटिलिटी डेस्क | Last Modified - Feb 10, 2018, 05:00 PM IST

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    महाशिवरात्रि पर्व इस बार दो दिन 13 और 14 फरवरी को श्रद्धाभाव के साथ मनाया जाएगा। ज्योतिषियों ने बताया कि सनातन धर्म में महाशिवरात्रि का खास महत्व है। भगवान शिव की आराधना का यह विशेष पर्व माना जाता है। कई शताब्दियों के बाद ऐसा विलक्षण संयोग बन रहा है, जब देवों के देव महादेव का पूजन-अर्चन करने का शुभ अवसर श्रद्धालुओं को मिलेगा। साथ ही विशेष योग शिव योग और सिद्धि योग में श्रद्धालु दोनों दिन भगवान शिव का महाभिषेक भी कर सकेंगे, जिससे जन्म-जन्मांतरों के पुण्यों का लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

    पं अमर डिब्बा वाला के अनुसार महाशिवरात्रि पर सिद्धि योग और भौम प्रदोष का संयोग सामन्यत: 32 साल में होता है, लेकिन ग्रह गोचर और संवत्सर की गणना के अनुसार 30 साल में ये योग बन रहा हैं। अधिकमास और ग्रहों की चाल में बदलाव होने के से इस बार ऐसा होगा। इससे चलित क्रम से मास योग का निर्माण भी हो रहा है।

    आगे पढ़ें निशिथ काल का मतलब और महत्व -

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    निशीथ व्यापिनी का हैं महत्व -

    ज्योतिषाचार्य पं प्रफुल्ल भट्‌ट के अनुसार फाल्गुन कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि के रुप में मनाया जाता है। कुछ लोग प्रदोष यानी त्रयोदशी तिथि के साथ पड़ रही चतुर्दशी को ये पर्व मनाते हैं वहीं कुछ निशीथ व्यापिनी यानी आधी रात को पड़ रही चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि मानते है, लेकिन अधिक महत्व निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी का ही है। उन्होंने बताया कि पौराणिक तथ्यानुसार इस दिन भगवान शिव की लिंग रूप में उत्पत्ति हुई थी। कुछ ग्रंथों के अनुसार इसी दिन भगवान शिव का देवी पार्वती से विवाह हुआ है। इसलिए सनातन धर्म को मानने वाले लोग इस दिन व्रत-उपवास के साथ विशेष पूजा और अभिषेक भी करते हैं। भगवान शिव सभी के अधिष्ठाता हैं। सभी देवी-देवता इन्हीं से प्रकट हुए हैं।

    ज्योतिषाचार्य पं प्रफुल्ल भट्‌ट ने बताया कि इस वर्ष ग्रहों की कुछ ऐसी स्थिति है, जिनके प्रभाव से दोनों दिन भगवान शिव की पूजा होगी। 13 फरवरी को रात्रि 10 बजकर 22 मिनट को चतुर्दशी प्रवेश हो रहा है और 14 फरवरी को चतुर्दशी सूर्योदय से लेकर रात्रि 12 बजकर 17 मिनट तक है। इसलिए तिथि-नक्षत्र के प्रभाव से इस साल शिवरात्रि के लिए दोनों दिन मान्य हैं। पं. भट्‌ट ने बताया कि ग्रंथ ईशान संहिता में भी स्पष्ट लिखा है कि ‘‘ फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्याम् आदि देवो महानिशि। शिवलिंगतयोद्भूतः कोटिसूर्यसमप्रभः।। तत्कालव्यापिनी ग्राहृा शिवरात्रिव्रते तिथिः।।’ यानी फाल्गुनकृष्ण चतुर्दशी की मध्यरात्रि में आदिदेव भगवान शिव लिंग रूप में अमितप्रभा के साथ उद्-भूूूत हुए यानी पहली बार दिखे। इसलिए अर्धरात्रि में होने वाली चतुर्दशी ही शिवरात्रि व्रत में मान्य है।

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    क्या होता है निशीथ काल -

    निशीथ का सामान्य मतलब अर्धरात्रि यानी रात 12 बजे होता है, लेकिन इस काल के निर्णय में भी विद्वानों में कुछ भेद है। कुछ विद्वानों ने कहा है कि रात के चार प्रहरों में दूसरे प्रहर की आखिरी घड़ी और तीसरे प्रहर की पहली घड़ी का मिला हुआ समय निशीथ काल होता है। वहीं मतान्तर से रात के पंद्रह मुहूर्त में से आठवां मुहूर्त निशीथ काल होता है।

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