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दत्त जयंतीः रविवार को इस विधि से करें भगवान दत्तात्रेय की पूजा

दत्तात्रेय भगवान विष्णु के ही अवतार हैं। इनका जन्म मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को प्रदोषकाल में हुआ था।

जीवन मंत्र डेस्क | Last Modified - Dec 01, 2017, 05:00 PM IST

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    मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को भगवान दत्तात्रेय की जयंती का पर्व मनाया जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इसी दिन भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ था। इस बार यह पर्व 3 दिसंबर, रविवार को है।
    धर्म ग्रंथों के अनुसार दत्तात्रेय भगवान विष्णु के ही अवतार हैं। इनका जन्म मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को प्रदोषकाल में हुआ था। ऐसी मान्यता है कि भक्त के स्मरण करते ही भगवान दत्तात्रेय उसकी हर समस्या का निदान कर देते हैं इसलिए इन्हें स्मृतिगामी व स्मृतिमात्रानुगन्ता भी कहा जाता है। श्रीमद्भागवत आदि ग्रंथों के अनुसार इन्होंने चौबीस गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की थी।
    भगवान दत्त के नाम पर दत्त संप्रदाय का उदय हुआ। गिरनार क्षेत्र श्रीदत्तात्रेय भगवान की सिद्धपीठ है। इनकी गुरुचरण पादुकाएं वाराणसी तथा आबू पर्वत आदि कई स्थानों पर हैं। दक्षिण भारत में इनके अनेक प्रसिद्ध मंदिर भी हैं। मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को भगवान दत्तात्रेय के निमित्त व्रत करने एवं उनके मंदिर में जाकर दर्शन-पूजन करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

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    तस्वीरों का इस्तेमाल प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

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    भगवान दत्त की पूजा विधि इस प्रकार है-
    सबसे पहले भगवान श्री दत्तात्रेय की प्रतिमा या चित्र को लाल कपड़े पर स्थापित करें। इसके बाद उनका आवाह्न करें। एक साफ बर्तन में पानी लेकर पास में रखें और सीधे हाथ में एक फूल और चावल के दाने लेकर इस प्रकार से विनियोग करें-


    ऊं अस्य श्री दत्तात्रेय स्तोत्र मंत्रस्य भगवान नारद ऋषि: अनुष्टुप छन्द:, श्री दत्त परमात्मा देवता:, श्री दत्त प्रीत्यर्थे जपे विनोयोग:।


    इतना कहकर फूल और चावल भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा या चित्र पर चढ़ा दें। इसके बाद हाथों को पानी से साफ कर लें और दोनों हाथों को जोड़कर प्रणाम मुद्रा में जाप स्तुति इस प्रकार करें-


    जटाधरं पाण्डुरंगं शूलहस्तं कृपानिधिम।
    सर्व रोग हरं देव, दत्तात्रेयमहं भज॥

    इसके बाद भगवान दत्तात्रेय की आरती करें और यह स्तोत्र पढ़ें-

    जगदुत्पति कत्र्रै च स्थिति संहार हेतवे।
    भव पाश विमुक्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    जराजन्म विनाशाय देह शुद्धि कराय च।
    दिगम्बर दयामूर्ति दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    कर्पूरकान्ति देहाय ब्रह्ममूर्तिधराय च।
    वेदशास्त्रं परिज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    ह्रस्व दीर्घ कृशस्थूलं नामगोत्रा विवर्जित।
    पंचभूतैकदीप्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    यज्ञभोक्त्रे च यज्ञाय यशरूपाय तथा च वै।
    यज्ञ प्रियाय सिद्धाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    आदौ ब्रह्मा मध्ये विष्णु: अन्ते देव: सदाशिव:।
    मूर्तिमय स्वरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    भोगलयाय भोगाय भोग योग्याय धारिणे।
    जितेन्द्रिय जितज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    दिगम्बराय दिव्याय दिव्यरूप धराय च।
    सदोदित प्रब्रह्म दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    जम्बूद्वीपे महाक्षेत्रे मातापुर निवासिने।
    जयमान सता देवं दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    भिक्षाटनं गृहे ग्रामं पात्रं हेममयं करे।
    नानास्वादमयी भिक्षा दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    ब्रह्मज्ञानमयी मुद्रा वक्त्रो चाकाश भूतले।
    प्रज्ञानधन बोधाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    अवधूत सदानन्द परब्रह्म स्वरूपिणे।
    विदेह देह रूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    सत्यरूप सदाचार सत्यधर्म परायण।
    सत्याश्रम परोक्षाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    शूल हस्ताय गदापाणे वनमाला सुकंधर।
    यज्ञसूत्रधर ब्रह्मान दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    क्षराक्षरस्वरूपाय परात्पर पराय च।
    दत्तमुक्ति परस्तोत्र दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    दत्तविद्याठ्य लक्ष्मीशं दत्तस्वात्म स्वरूपिणे।
    गुणनिर्गुण रूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥
    शत्रु नाश करं स्तोत्रं ज्ञान विज्ञान दायकम।
    सर्वपाप शमं याति दत्तात्रेय नमोऽस्तुते॥

    इस स्त्रोत के बाद 108 बार नीचे लिखे मंत्र का जाप कर पूजा संपन्न करें-

    ऊं द्रां दत्तात्रेयाय नम:

    भगवान दत्तात्रेय के जन्म की कथा जानने के लिए आगे की स्लाइड पर क्लिक करें-

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    धर्म ग्रंथों के अनुसार, दत्तात्रेय भगवान विष्णु के अवतार हैं। इनके जन्म की कथा इस प्रकार है-
    एक बार माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती को अपने पातिव्रत्य पर अत्यंत गर्व हो गया। भगवान ने इनका अंहकार नष्ट करने के लिए लीला रची। उसके अनुसार एक दिन नारदजी घूमते-घूमते देवलोक पहुंचे और तीनों देवियों को बारी-बारी जाकर कहा कि अत्रिपत्नी अनुसूईया के सामने आपका सतीत्व कुछ भी नहीं। तीनों देवियों ने यह बात अपने स्वामियों को बताई और उनसे कहा कि वे अनुसूइया के पातिव्रत्य की परीक्षा लें।
    तब भगवान शंकर, विष्णु व ब्रह्मा साधुवेश बनाकर अत्रि मुनि के आश्रम आए। महर्षि अत्रि उस समय आश्रम में नहीं थे। तीनों ने देवी अनुसूइया से भिक्षा मांगी मगर यह भी कहा कि आपको निर्वस्त्र होकर हमें भिक्षा देनी होगी। अनुसूइया पहले तो यह सुनकर चौंक गई लेकिन फिर साधुओं का अपमान न हो इस डर से उन्होंने अपने पति का स्मरण किया और बोला कि यदि मेरा पातिव्रत्य धर्म सत्य है तो ये तीनों साधु छ:-छ: मास के शिशु हो जाएं। और तुरंत तीनों देव शिशु होकर रोने लगे।
    तब अनुसूइया ने माता बनकर उन्हें गोद में लेकर स्तनपान कराया और पालने में झूलाने लगीं। जब तीनों देव अपने स्थान पर नहीं लौटे तो देवियां व्याकुल हो गईं। तब नारद ने वहां आकर सारी बात बताई। तीनों देवियां अनुसूइया के पास आईं और क्षमा मांगी। तब देवी अनुसूइया ने त्रिदेव को अपने पूर्व रूप में कर दिया। प्रसन्न होकर त्रिदेव ने उन्हें वरदान दिया कि हम तीनों अपने अंश से तुम्हारे गर्भ से पुत्ररूप में जन्म लेंगे। तब ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा और विष्णु के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ।

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