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पुत्रदा एकादशी 29 कोः इस विधि से करें व्रत, ये हैं महत्व व कथा

पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं। इस एकादशी का महत्व पुराणों में भी लिखा है।

जीवन मंत्र डेस्क | Last Modified - Dec 28, 2017, 07:00 AM IST

पुत्रदा एकादशी 29 कोः इस विधि से करें व्रत, ये हैं महत्व व कथा

पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं। इस एकादशी का महत्व पुराणों में भी लिखा है। इस बार यह एकादशी 29 दिसंबर, शुक्रवार को है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इस व्रत से योग्य संतान की प्राप्ति होती है। इसकी विधि इस प्रकार है-


व्रत व पूजन विधि
पुत्रदा एकादशी के दिन नाम-मंत्रों का उच्चारण करके फलों के द्वारा भगवान नारायण की पूजा करें। नारियल, सुपारी, नींबू, अनार, आँवला, लौंग, बेर तथा विशेषत: आम के फलों से भगवान नारायण की पूजा करें। इसी प्रकार धूप दीप से भी भगवान की अर्चना करें।
पुत्रदा एकादशी की रात्रि को जागरण करना चाहिए। जागरण करने वाले को जिस फल की प्राप्ति होती है, वह हजारों वर्ष तक तपस्या करने से भी नहीं मिलता। जो पुत्रदा एकादशी का व्रत करते हैं, वे इस लोक में योग्य पुत्र पाकर मृत्यु के पश्चात् स्वर्गगामी होते हैं। इस माहात्म्य को पढऩे और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।

पुत्रदा एकादशी की कथा इस प्रकार है-
पहले किसी समय में भद्रावतीपुरी में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम चम्पा था। उनके यहां कोई संतान नहीं थी, इसलिए दोनों पति-पत्नी सदा चिन्ता और शोक में रहते थे। इसी शोक में एक दिन राजा राजा सुकेतुमान वन में चले गये। जब राजा को प्यास लगी तो वे एक सरोवर के निकट पहुंचे। वहां बहुत से मुनि वेदपाठ कर रहे थे। राजा ने उन सभी मुनियों को वंदना की।
प्रसन्न होकर मुनियों ने राजा से वरदान मांगने को कहा। मुनि बोले कि पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकदाशी कहते हैं। उस दिन व्रत रखने से योग्य संतान की प्राप्ति होती है। तुम भी वही व्रत करो। ऋषियों के कहने पर राजा ने पुत्रदा एकादशी का व्रत किया। कुछ ही दिनों बाद रानी चम्पा ने गर्भधारण किया। उचित समय आने पर रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसने अपने गुणों से पिता को संतुष्ट किया तथा न्यायपूर्वक शासन किया।

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