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पाना चाहते हैं जीवन के 4 सबसे खास सुख तो हमेशा करते रहें ये एक काम

रामायण: गुरु और घर-परिवार के बड़ों की सेवा करने से मिलते हैं ये 4 सुख

यूटीलिटी डेस्क | Last Modified - Jan 02, 2018, 05:00 PM IST

    • वाल्मीकि रामायण हिंदू धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथों में से एक है। इसमें भगवान राम के जीवन के बारे में बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है। इसमें मनुष्य के लिए कई ऐसी बातें भी बताई गई हैं, जो उसे जीवन के सभी सुख दिला सकती हैं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, अपने गुरुओं या घर में अपने बुगुर्जों की सेवा करने से मनुष्य को इन चार बातों की प्राप्ति निश्चित रूप से होती है।

      श्लोक-

      स्वार्गो धनं वा धान्यं वा विद्या पुत्राः सुखानि च।

      गुरुवृत्तयनुरोधेन न किंचदपि दुर्लभम्।

      1. धन-धान्य

      सभी ग्रथों में अपने गुरुओं और बुजुर्गों की सेवा करना हर मनुष्य का धर्म बताया गया है। जिस घर में गुरुओं और बड़ों की सेवा और सम्मान किया जाता है, वहां कभी किसी चीज की कमी नहीं होती है। ऐसा घर धन से लेकर धान्य यानि अनाज से हमेशा भरा रहता है। गुरु और अपने घर के बुजुर्गों को देवतुल्य मानना ही हिंदू धर्म के संस्कार है और इसका पालन करने वाला हमेशा सुखी रहता है।

      2. विद्या

      गुरु ही मनुष्य को शिक्षा देना वाला होता है। जो मनुष्य अपने गुरु का सम्मान-सेवा नहीं करता, वह कभी भी सफलता दिलाने वाली शिक्षा नहीं पा सकता। गुरुओं का आदर करना और उनकी दी गई सीख पर भरोसा करके उसका पालन करने वाला मनुष्य जीवन में किसी भी कठिनाई का सामान बहुत ही आसानी से कर सकता है। अच्छी विद्या पाने के लिए गुरु का आदर-सम्मान करना सबसे जरूरी होता है। जिस तरह पांडवों ने अपने गुरु द्रोणाचार्य पर हमेशा विश्वास रखा, उनकी दी गई सीख पर कभी शक नहीं किया, जिसकी वजह से वे मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति का सामना बड़ी ही आसानी से कर जाते थे। उसके विपरित कौरवों ने हमेशा ही अपने गुरु के प्रति बुरी भावनाएं मन में रखीं, जिसका परिणाम उन्हें युद्ध भूमि में भुगतना पड़ा।

      3. संतान

      कहा जाता है कि हर किसी को अपने कर्मों का फल इसी जीवन में किसी न किसी रूप में भोगना ही पड़ता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, जो मनुष्य अपने घर के बड़ों और अपने गुरुओं का सम्मान नहीं करता, उसे संतान से कभी सुख नहीं मिलता। जैसे व्यवहार उस मनुष्य ने अपने गुरुजनों और घर के बुगुर्जों के साथ किया, वैसा ही व्यवहार उसकी संतानें उसके साथ करती है। इसलिए हमेशा अपने गुरुओं के प्रति आदर का भाव रखना चाहिए और अपनी संतान को भी बचपन से ही यही सीख देनी चाहिए।

      4. स्वर्ग

      मनुष्य के कर्म ही भविष्य को तय करते हैं। जो मनुष्य अपने जीवन में आदर्शों और संस्कारों का पालन करता है, उसे निश्चित ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में ऐसे कई उदाहरण पाए जाते हैं, जिनसे हमें ये पता चलता है कि गुरु और ऋषि-मुनियों की सेवा करके किसी भी गलती या पाप का प्रायश्चित किया जा सकता है। गुरु को देव तुल्य मानना चाहिए, जो भी अपने गुरु को देवता के समान पूजता है, उसके सभी पापों का नाश हो जाता है।

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