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चैत्र नवरात्र 18 से, जानिए घट स्थापना के शुभ मुहूर्त व संपूर्ण विधि

मां शक्ति की आराधना का पर्व चैत्र नवरात्र 18 मार्च, रविवार से शुरू हो रहा है, जो 25 मार्च, रविवार तक रहेगा।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Mar 16, 2018, 05:00 PM IST

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    यूटिलिटी डेस्क.मां शक्ति की आराधना का पर्व चैत्र नवरात्र 18 मार्च, रविवार से शुरू हो रहा है, जो 25 मार्च, रविवार तक रहेगा। नवरात्र के पहले दिन माता दुर्गा की प्रतिमा तथा घट (कलश) की स्थापना की जाती है। इसके बाद ही नवरात्र उत्सव का प्रारंभ होता है। माता दुर्गा व घट स्थापना की विधि इस प्रकार हैं-

    ये है घट स्थापना की विधि

    पवित्र स्थान की मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूं बोएं। फिर उनके ऊपर अपनी इच्छा अनुसार सोने, तांबे अथवा मिट्टी के कलश की स्थापना करें। कलश के ऊपर सोना, चांदी, तांबा, मिट्टी, पत्थर या चित्रमयी मूर्ति रखें। मूर्ति यदि कच्ची मिट्टी, कागज या सिंदूर आदि से बनी हो और स्नानादि से उसमें विकृति आने की संभावना हो तो उसके ऊपर शीशा लगा दें।
    मूर्ति न हो तो कलश पर स्वस्तिक बनाकर दुर्गाजी का चित्र पुस्तक तथा शालिग्राम को विराजित कर भगवान विष्णु की पूजा करें। नवरात्र व्रत के आरंभ में स्वस्तिक वाचन-शांतिपाठ करके संकल्प करें और सबसे पहले भगवान श्रीगणेश की पूजा कर मातृका, लोकपाल, नवग्रह व वरुण का सविधि पूजन करें। फिर मुख्य मूर्ति की पूजा करें। दुर्गादेवी की आराधना-अनुष्ठान में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन तथा मार्कण्डेयपुराणान्तर्गत निहित श्रीदुर्गासप्तशती का पाठ नौ दिनों तक प्रतिदिन करना चाहिए।

    ये हैं घट स्थापना के शुभ मुहूर्त

    सुबह 06:40 से 07:50 तक
    सुबह 08:10 से दोपहर 12:35 तक
    दोपहर 12:07 से 12:35 तक (अभिजित मुहूर्त)
    दोपहर 2:10 से 3:30 तक

    नवरात्र में अखंड ज्योत जलाते समय किन बातों का ध्यान रखें, ये जानने के लिए आगे की स्लाइड पर क्लिक करें-

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    ध्यान रखें ये 4 बातें
    1. नवरात्र में माता दुर्गा के सामने नौ दिन तक अखंड ज्योत जलाई जाती है। यह अखंड ज्योत माता के प्रति आपकी अखंड आस्था का प्रतीक स्वरूप होती है। माता के सामने एक तेल व एक शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए।
    2. मान्यता के अनुसार, मंत्र महोदधि (मंत्रों की शास्त्र पुस्तिका) के अनुसार, दीपक या अग्नि के समक्ष किए गए जाप का साधक को हजार गुना फल प्राप्त हो है। कहा जाता है-
    दीपम घृत युतम दक्षे, तेल युत: च वामत:।
    अर्थात-घी का दीपक देवी के दाहिनी ओर तथा तेल वाला दीपक देवी के बाईं ओर रखना चाहिए।
    3. अखंड ज्योत पूरे नौ दिनों तक जलती रहनी चाहिए। इसके लिए एक छोटे दीपक का प्रयोग करें। जब अखंड ज्योत में घी डालना हो, बत्ती ठीक करनी हो तो या गुल झाड़ना हो तो छोटा दीपक अखंड दीपक की लौ से जलाकर अलग रख लें।
    4. यदि अखंड दीपक को ठीक करते हुए ज्योत बुझ जाती है तो छोटे दीपक की लौ से अखंड ज्योत पुन: जलाई जा सकती है छोटे दीपक की लौ को घी में डूबोकर ही बुझाएं।

    आगे की स्लाइड में जानिए कैसे करें माता दुर्गा की आरती

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    इस आसान विधि से करें मां दुर्गा की आरती
    हिंदू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म-कांड के बाद भगवान की आरती उतारने का विधान है। भगवान की आरती उतारने के भी कुछ विशेष नियम होते हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि देवताओं के सम्मुख चौदह बार आरती उतारना चाहिए। चार बार चरणों पर से, दो बार नाभि पर से, एक बार मुख पर से तथा सात बार पूरे शरीर पर से। आरती की बत्तियाँ 1, 5, 7 अर्थात विषम संख्या में ही बनाकर आरती की जानी चाहिए।

    मां दुर्गा की आरती
    जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
    तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिव री ॥1॥ जय अम्बे…
    माँग सिंदूर विराजत टीको मृगमदको।
    उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको ॥2॥ जय अम्बे....
    कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै।
    रक्त-पुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै ॥3॥ जय अम्बे…
    केहरी वाहन राजत, खड्ग खपर धारी।
    सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुखहरी ॥4॥ जय अम्बे…
    कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
    कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योति ॥5॥ जय अम्बे…
    शुंभ निशुंभ विदारे, महिषासुर-धाती।
    धूम्रविलोचन नैना निशिदिन मदमाती ॥6॥ जय अम्बे…
    चण्ड मुण्ड संहारे, शोणितबीज हरे।
    मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे ॥7॥ जय अम्बे…
    ब्रह्माणी, रूद्राणी तुम कमलारानी।
    आगम-निगम-बखानी, तुम शिव पटरानी ॥8॥ जय अम्बे…
    चौसठ योगिनि गावत, नृत्य करत भैरूँ।
    बाजत ताल मृदंगा औ बाजत डमरू ॥9॥ जय अम्बे…
    तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
    भक्तन की दुख हरता सुख सम्पति करता ॥10॥ जय अम्बे…
    भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी।
    मनवाञ्छित फल पावत, सेवत नर-नारी ॥11॥ जय अम्बे…
    कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
    (श्री) मालकेतु में राजत कोटिरतन ज्योती ॥12॥ जय अम्बे…
    (श्री) अम्बेजी की आरती जो कोई नर गावै।
    कहत शिवानंद स्वामी, सुख सम्पति पावै ॥13॥ जय अम्बे...

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