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इनके श्राप के कारण हुई थी दुर्योधन की मृत्यु, जानें महाभारत की 3 अनजानी बातें

3 अनजानी बातें: यह एक श्राप बना था दुर्योधन की मृत्यु का कारण

यूटीलिटी डेस्क | Last Modified - Jan 05, 2018, 05:00 PM IST

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    महाभारत की कहानी तो ज्यादातर लोग जानते हैं लेकिन इसकी सभी बातें हर किसी को नहीं पता है। कई घटनाएं और कहानियां ऐसी हैं जो लोगों ने सुनी नहीं है। ऐसी ही कुछ बाते हम आपको बता रहे हैं। दुर्योधन को मारने के लिए भीम ने भरी सभा में प्रतिज्ञा की थी, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि युद्ध के कुछ सालों पहले ही एक ऋषि ने उसको युद्ध में मारे जाने का श्राप भी दिया था।

    महाभारत के वनपर्व के अनुसार, जुए में हारने की वजह से पांडव वन चले गए थे। एक बार जब धृतराष्ट्र अपने महल में बैठे थे, तभी महान ऋषि मैत्रेय वहां आ गए। धृतराष्ट्र और उनके पुत्रों ने उनका बहुत स्वागत-सत्कार किया। महर्षि मैत्रेय धृतराष्ट्र पर स्नेह रखते थे। इसलिए, उन्होंने धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन को अधर्म और जलन की भावना छोड़ कर धर्म का साथ देने को कहा। वे उसे पांडवों से दुश्मनी छोड़ कर मित्रता करने को कहने लगे। ऋषि की बात का अपमान करते हुए दुर्योधन उन पर हंसने लगा। इस अपमान से ऋषि बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने कुरूक्षेत्र में होने वाले युद्ध का कारण दुर्योधन को बताया। साथ ही भीम के हाथों उसकी जांघ तोड़ने और मारे जाने का श्राप दे दिया। यही श्राप दुर्योधन की मृत्यु का कारण बना था।

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    श्रीकृष्ण पहले ही बता चुके थे कर्ण को कुंती पुत्र होने का राज

    महाभारत के उघोगपर्व के अनुसार, श्रीकृष्ण पांडवों की ओर से संधि करने का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर गए थे। उन्होंने दुर्योधन को युद्ध रोक कर, पांडवों को आधा राज्य देने को कहा। लेकिन, दुर्योधन ने वह प्रस्ताव नहीं माना और पांडवों को युद्ध करने को कहा। श्रीकृष्ण दुर्योधन का संदेश लेकर पांडवों के राज्य जा रहा थे। तभी रास्ते में उन्होंने कर्ण को देखा और उसे रथ में बैठा लिया। रथ में श्रीकृष्ण ने कर्ण को उसके कुंती पुत्र होने का रहस्य बताया। साथ कुंती ने उसे क्यों त्यागा था इसका कारण भी बता दिया। कर्ण को भी एक पांडव बताते हुए श्रीकृष्ण ने उसे कौरवों का साथ छोड़ कर, पांडवों की ओर से युद्ध करने को कहा। कर्ण ने कौरवों के उपकारों की वजह से युद्ध में उन्हीं का साथ देना की बात कहीं। इस प्रकार कुंती के बताने के पहले ही कर्ण जान चुके थे, उसके कुंती पुत्र होने का राज।

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    जल के देवता वरुण ने दिया था अर्जुन को गांडीव धनुष

    महाभारत के आदिपर्व के अनुसार, एक बार श्रीकृष्ण और अर्जुन खांडव नामक वन में घूम रहे थे। तभी वहां अग्नि देव आ गए। वे बहुत ही कमजोर दिखाई पड़ रहे थे। श्रीकृष्ण और अर्जुन के पूछने पर उन्होंने बताया कि यज्ञों में लगातार घी पीने की वजह से उनका शरीर कमजोर हो गया है। उन्होंने बताया कि खांडव वन जलाने से वह पहले की तरह स्वस्थ हो सकते हैं, लेकिन इस वन में देवराज इंद्र का मित्र तक्षक नाग रहता है, जिसके कारण इंद्र इस वन की रक्षा करते हैं। तब अग्निदेव ने खांडव वन को जलाने में अर्जुन व श्रीकृष्ण की सहायता मांगी। तब अर्जुन ने अग्निदेव से कहा कि मेरे पास दिव्यास्त्र तो बहुत हैं, लेकिन इन्द्र का भार सहन करने वाला धनुष नहीं है। अर्जुन की बात सुनकर अग्निदेव ने वरुणदेव का स्मरण किया और वरुणदेव ने अपना गांडीव धनुष अर्जुन को दे दिया। इसी धनुष की सहायता से अर्जुन ने खांडव वन का दहन किया।

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