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रोचक बातें: स्वयंवर में नहीं, ऐसे हुआ था श्रीराम और सीता का विवाह

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को राम नवमी का पर्व मनाया जाता है।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Mar 25, 2018, 03:14 PM IST

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    यूटिलिटी डेस्क. चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को राम नवमी का पर्व मनाया जाता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, त्रेता युग में इस तिथि पर भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। इस बार ये पर्व 25 मार्च, रविवार को है। भगवान श्रीराम के जीवन का वर्णन यूं तो कई ग्रंथों में मिलता है, लेकिन इन सभी में वाल्मीकि रामायण में लिखे गए तथ्यों को ही सबसे सटीक माना गया है। वाल्मीकि रामायण में कुछ ऐसी रोचक बातें बताई गई हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं। आज हम आपको कुछ ऐसी ही रोचक बातें बता रहे हैं। ये बातें इस प्रकार हैं-


    सीता स्वयंवर में नहीं गए श्रीराम
    श्रीरामचरित मानस में लिखा है कि श्रीराम सीता स्वयंवर में गए थे, जबकि वाल्मीकि रामायण में सीता स्वयंवर का वर्णन नहीं है। उसके अनुसार, राम व लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ मिथिला गए थे। विश्वामित्र ने ही राजा जनक से श्रीराम को वह शिवधनुष दिखाने के लिए कहा। तब श्रीराम ने उस धनुष को उठा लिया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। राजा जनक ने यह प्रण किया था कि जो भी इस शिव धनुष को उठा लेगा, उसी से वे अपनी पुत्री सीता का विवाह कर देंगे। इसी प्रतिज्ञा के कारण श्रीराम के विवाह सीता के साथ हुआ।


    नहीं हुआ लक्ष्मण व परशुराम में विवाद
    श्रीरामचरित मानस के अनुसार, सीता स्वयंवर के समय भगवान परशुराम वहां आए थे और लक्ष्मण से उनका विवाद भी हुआ था। जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार, सीता से विवाह के बाद जब श्रीराम अयोध्या लौट रहे थे, तब रास्ते में उन्हें परशुराम मिले। उन्होंने श्रीराम से अपने धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम ने जब उनके धनुष पर बाण चढ़ा दिया तो बिना किसी से विवाद किए वे वहां से चले गए।

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    हिरणी से हुआ था इन ऋषि का जन्म
    रामायण के अनुसार, राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ ऋषि ऋष्यश्रृंग ने करवाया था। ऋष्यश्रृंग के पिता का नाम महर्षि विभाण्डक था। एक दिन जब वे नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में उनका वीर्यपात हो गया। उस जल को एक हिरणी ने पी लिया, जिसके फलस्वरूप ऋषि ऋष्यश्रृंग का जन्म हुआ था। इनके सिर पर हिरण की तरह एक सींग भी था।


    इसलिए श्रीराम के हाथों मरा रावण
    रघुवंश में एक परम प्रतापी राजा हुए थे, जिनका नाम अनरण्य था। जब रावण विश्वविजय करने निकला तो राजा अनरण्य से उसका भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्ध में राजा अनरण्य की मृत्यु हो गई, लेकिन मरने से पहले उन्होंने रावण को श्राप दिया कि मेरे ही वंश में उत्पन्न एक युवक तेरी मृत्यु का कारण बनेगा।

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    यमराज से भी हुआ था रावण का युद्ध
    रावण जब विश्व विजय पर निकला तो वह यमलोक भी जा पहुंचा। वहां यमराज और रावण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जब यमराज ने रावण के प्राण लेने के लिए कालदण्ड का प्रयोग करना चाहा तो ब्रह्मा ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया क्योंकि किसी देवता द्वारा रावण का वध संभव नहीं था।

    कबंध को श्रापमुक्त किया था श्रीराम ने
    जब श्रीराम और लक्ष्मण वन में सीता की खोज कर रहे थे। उस समय कबंध नामक राक्षस का राम-लक्ष्मण ने वध किया था। वास्तव में कबंध एक श्राप के कारण राक्षस बन गया था। जब श्रीराम ने उसका दाह संस्कार किया तो वह श्राप मुक्त हो गया। कबंध ने ही श्रीराम को सुग्रीव से मित्रता करने के लिए कहा था।

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    लक्ष्मण नहीं श्रीराम हुए थे क्रोधित
    श्रीरामचरितमानस के अनुसार, समुद्र ने जब वानर सेना को लंका जाने के लिए रास्ता नहीं दिया तो लक्ष्मण बहुत क्रोधित हुए थे, जबकि वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि लक्ष्मण नहीं श्रीराम समुद्र पर क्रोधित हुए थे और उन्होंने समुद्र को सूखा देने वाले बाण भी छोड़ दिए थे। तब लक्ष्मण व अन्य लोगों ने भगवान श्रीराम को समझाया था।

    विश्वकर्मा के पुत्र थे नल
    सभी जानते हैं कि समुद्र पर पुल का निर्माण नल और नील नामक वानरों ने किया था। क्योंकि उन्हें श्राप मिला था कि उनके द्वारा पानी में फेंकी गई वस्तु पानी में डूबेगी नहीं, जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार, नल देवताओं के शिल्पी (इंजीनियर) विश्वकर्मा के पुत्र थे और वह स्वयं भी शिल्पकला में निपुण थे। अपनी इसी कला से उसने समुद्र पर पुल का निर्माण किया था।

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    पांच दिन में बना था रामसेतु
    वाल्मीकि रामायण के अनुसार, समुद्र पर पुल बनाने में 5 दिन का समय लगा। पहले दिन वानरों ने 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवे दिन 23 योजन पुल बनाया था। इस प्रकार कुल 100 योजन लंबाई का पुल समुद्र पर बनाया गया। यह पुल 10 योजन चौड़ा था।


    इंद्र ने भेजा था श्रीराम के लिए रथ
    जिस समय राम-रावण का अंतिम युद्ध चल रहा था, उस समय इंद्र ने अपना रथ श्रीराम के लिए भेजा था। उस रथ पर बैठकर ही श्रीराम ने रावण को मारा था। जब काफी समय तक राम-रावण का युद्ध चलता रहा तब अगस्त्य मुनि ने श्रीराम से आदित्यह्रदय स्त्रोत का पाठ करने को कहा, इसके बाद ही श्रीराम ने रावण का वध किया।

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