Home » Jeevan Mantra »Jeene Ki Rah »Dharm Granth » Hanuman Jayanti 2018, Hanuman S Intersting Stories,

पांडवों के युद्ध जीतने के बाद कब तक उनके साथ रहे हनुमान, उसके बाद क्या हुआ?

31 मार्च, शनिवार को हनुमान जयंती का पर्व है। इस अवसर पर आपको बता रहे हैं हनुमानजी से जुड़ी कुछ रोचक बातें।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Mar 28, 2018, 07:11 PM IST

  • पांडवों के युद्ध जीतने के बाद कब तक उनके साथ रहे हनुमान, उसके बाद क्या हुआ?
    +6और स्लाइड देखें

    यूटिलिटी डेस्क. 31 मार्च, शनिवार को हनुमान जयंती का पर्व है। इस अवसर पर आपको बता रहे हैं हनुमानजी से जुड़ी कुछ रोचक बातें। महाभारत के अनुसार, युद्ध के दौरान अर्जुन के रथ पर स्वयं हनुमानजी विराजित थे। युद्ध समाप्त होने के बाद हनुमानजी कब तक पांडवों के साथ रहे और उनके जाने के बाद क्या हुआ, जानिए-


    जब अर्जुन के रथ से उड़े हनुमानजी
    महाभारत के अनुसार, जब कौरव सेना का नाश हो गया तो दुर्योधन भाग कर एक तालाब में छिप गया। पांडवों को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने दुर्योधन को युद्ध के लिए ललकारा। दुर्योधन तालाब से बाहर निकला और भीम ने उसे पराजित कर दिया। दुर्योधन को मरणासन्न अवस्था में छोड़कर पांडव अपने-अपने रथों पर कौरवों के शिविर में आए। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पहले रथ से उतरने को कहा, बाद में वे स्वयं उतरे।
    श्रीकृष्ण के उतरते ही अर्जुन के रथ पर बैठे हनुमानजी भी उड़ गए। तभी देखते ही देखते अर्जुन का रथ जल कर राख हो गया। यह देख अर्जुन ने श्रीकृष्ण से इसका कारण पूछा? तब श्रीकृष्ण ने बताया कि ये रथ तो दिव्यास्त्रों के वार से पहले ही जल चुका था, सिर्फ मेरे बैठे रहने के कारण ही अब तक यह भस्म नहीं हुआ था। जब तुम्हारा काम पूरा हो गया, तभी मैंने इस रथ को छोड़ा। इसलिए यह अभी भस्म हुआ है।

    इसलिए अर्जुन के रथ पर बैठे थे हनुमानजी
    महाभारत के अनुसार, वनवास के दौरान पांडव जब बदरिकाश्रम में रह रहे थे, तभी एक दिन वहां उड़ते हुए एक सहस्त्रदल कमल आ गया। उसकी गंध बहुत ही मनमोहक थी। उस कमल को द्रौपदी ने देख लिया। द्रौपदी ने उसे उठा लिया और भीम से कहा- यह कमल बहुत ही सुंदर है। मैं यह कमल धर्मराज युधिष्ठिर को भेंट करूंगी। अगर आप मुझसे प्रेम करते हैं तो ऐसे बहुत से कमल मेरे लिए लेकर आइए। द्रौपदी के ऐसा कहने पर भीम उस दिशा की ओर चल दिए, जिधर से वह कमल उड़ कर आया था। भीम के चलने से बादलों के समान भीषण आवाज आती थी, जिससे घबराकर उस स्थान पर रहने वाले पशु-पक्षी अपना आश्रय छोड़कर भागने लगे।


    पूरा प्रसंग जानने के लिए आगे की स्लाइड्स पर क्लिक करें-

  • पांडवों के युद्ध जीतने के बाद कब तक उनके साथ रहे हनुमान, उसके बाद क्या हुआ?
    +6और स्लाइड देखें

    गंधमादन पर्वत पर रहते थे हनुमानजी
    कमल पुष्प की खोज में चलते-चलते भीम एक केले के बगीचे में पहुंच गए। यह बगीचा गंधमादन पर्वत की चोटी पर कई योजन लंबा-चौड़ा था। भीम नि:संकोच उस बगीचे में घुस गए। इस बगीचे में भगवान श्रीहनुमान रहते थे। उन्हें अपने भाई भीमसेन के वहां आने का पता लग गया। (धर्म ग्रंथों के अनुसार, हनुमानजी पवन देवता के पुत्र हैं और भीम भी, इसलिए ये दोनों भाई हैं।) हनुमानजी ने सोचा कि यह मार्ग भीम के लिए उचित नहीं है। यह सोचकर उनकी रक्षा करने के विचार से वे केले के बगीचे में से होकर जाने वाले संकरे रास्ते को रोककर लेट गए।


    भीम को रोकना चाहते थे हनुमान
    भीम को बगीचे के संकरे रास्ते पर लेटे हुए वानरराज हनुमान दिखाई दिए। उनके होंठ पतले थे, जीभ और मुंह लाल थे, कानों का रंग भी लाल-लाल था, भौंहें चंचल थीं तथा खुले हुए मुख में सफेद, नुकीले और तीखे दांत और दाढ़ें दिखती थीं। बगीचे में इस प्रकार एक वानर को लेटे हुए देखकर भीम उनके पास पहुंचे और जोर से गर्जना की। हनुमानजी ने अपनी आंखें खोलकर उपेक्षापूर्वक भीम की ओर देखा और कहा- तुम कौन हो और यहां क्या कर रहे हो? मैं रोगी हूं, यहां आनंद से सो रहा था, तुमने मुझे क्यों जगा दिया? यहां से आगे यह पर्वत अगम्य है, इस पर कोई नहीं चढ़ सकता। अत: तुम यहां से चले जाओ।

  • पांडवों के युद्ध जीतने के बाद कब तक उनके साथ रहे हनुमान, उसके बाद क्या हुआ?
    +6और स्लाइड देखें

    भीम ने ऐसे दिया हनुमानजी को अपना परिचय
    हनुमानजी की बात सुनकर भीम बोले- वानरराज। आप कौन हैं और यहां क्या कर रहे हैं? मैं तो चंद्रवंश के अंतर्गत कुरुवंश में उत्पन्न हुआ हूं। मैंने माता कुंती के गर्भ से जन्म लिया है और मैं महाराज पाण्डु का पुत्र हूं। लोग मुझे वायुपुत्र भी कहते हैं। मेरा नाम भीम है।
    भीम की बात सुनकर हनुमानजी बोले- मैं तो बंदर हूं, तुम जो इस रास्ते से जाना चाहते हो तो मैं तुम्हें इधर से नहीं जाने दूंगा। अच्छा तो यही हो कि तुम यहां से लौट जाओ, नहीं तो मारे जाओगे।
    यह सुनकर भीम ने कहा - मैं मरुं या बचूं, तुमसे तो इस विषय में नहीं पूछ रहा हूं। तुम उठकर मुझे रास्ता दो।
    हनुमान बोले- मैं रोगी हूं, यदि तुम्हें जाना ही है तो मुझे लांघकर चले जाओ।

  • पांडवों के युद्ध जीतने के बाद कब तक उनके साथ रहे हनुमान, उसके बाद क्या हुआ?
    +6और स्लाइड देखें

    जब भीम ने हनुमान से मांगा जाने का रास्ता
    भीम बोले- संसार के सभी प्राणियों में ईश्वर का वास है, इसलिए मैं तुम्हारा लंघन कर परमात्मा का अपमान नहीं करुंगा। यदि मुझे परमात्मा के स्वरूप का ज्ञान न होता तो मैं तुम्ही को क्या, इस पर्वत को भी उसी प्रकार लांघ जाता जैसे हनुमानजी समुद्र को लांघ गए थे।
    हनुमानजी ने कहा- यह हनुमान कौन था, जो समुद्र को लांघ गया था? उसके विषय में तुम कुछ कह सकते हो तो कहो।
    भीम बोले- वे वानर मेरे भाई हैं। वे बुद्धि, बल और उत्साह से संपन्न तथा बड़े गुणवान हैं और रामायण में बहुत ही विख्यात हैं। वे श्रीरामचंद्रजी की पत्नी सीताजी की खोज करने के लिए एक ही छलांग में सौ योजन बड़ा समुद्र लांघ गए थे। मैं भी बल और पराक्रम में उन्हीं के समान हूं। इसलिए तुम खड़े हो जाओ मुझे रास्ता दो। यदि मेरी आज्ञा नहीं मानोगे तो मैं तुम्हें यमपुरी पहुंचा दूंगा।

  • पांडवों के युद्ध जीतने के बाद कब तक उनके साथ रहे हनुमान, उसके बाद क्या हुआ?
    +6और स्लाइड देखें

    जब हनुमानजी की पूंछ नहीं उठा पाए भीम
    भीम की बात सुनकर हनुमानजी बोले- हे वीर। तुम क्रोध न करो, बुढ़ापे के कारण मुझमें उठने की शक्ति नहीं है इसलिए कृपा करके मेरी पूंछ हटाकर निकल जाओ। यह सुनकर भीम हंसकर अपने बाएं हाथ से हनुमानजी पूंछ उठाने लगे, किंतु वे उसे टस से मस न कर सके। फिर उन्होंने दोनों हाथों से पूंछ उठाने का प्रयास किया, लेकिन इस बार भी वे असफल रहे। तब भीम लज्जा से मुख नीचे करके वानरराज के पास पहुंचे और कहा- आप कौन हैं? अपना परिचय दीजिए और मेरे कटु वचनों के लिए मुझे क्षमा कर दीजिए।
    तब हनुमानजी ने अपना परिचय देते हुए कहा कि इस मार्ग में देवता रहते हैं, मनुष्यों के लिए यह मार्ग सुरक्षित नहीं है, इसीलिए मैंने तुम्हें रोका था। तुम जहां जाने के लिए आए हो, वह सरोवर तो यहीं है।


    हनुमानजी ने भीम को बताया था चारों युगों के बारे में
    हनुमानजी की बात सुनकर भीम बहुत प्रसन्न हुए और बोले- आज मेरे समान कोई भाग्यवान नहीं है। आज मुझे अपने बड़े भाई के दर्शन हुए हैं। किंतु मेरी एक इच्छा है, वह आपको अवश्य पूरी करनी होगी। समुद्र को लांघते समय आपने जो विशाल रूप धारण किया था, उसे मैं देखना चाहता हूं।
    भीम के ऐसा कहने पर हनुमानजी ने कहा- तुम उस रूप को नहीं देख सकते और न कोई अन्य पुरुष उसे देख सकता है। सतयुग का समय दूसरा था और त्रेता और द्वापर का भी दूसरा है। काल तो निरंतर क्षय करने वाला है, अब मेरा वह रूप है ही नहीं।
    तब भीमसेन ने कहा- आप मुझे युगों की संख्या और प्रत्येक युग के आचार, धर्म, अर्थ और काम के रहस्य, कर्मफल का स्वरूप तथा उत्पत्ति और विनाश के बारे में बताइए।
    भीम के आग्रह पर हनुमानजी ने उन्हें कृतयुग, त्रेतायुग फिर द्वापरयुग व अंत में कलयुग के बारे में बताया।
    हनुमानजी ने कहा- अब शीघ्र ही कलयुग आने वाला है। इसलिए तुम्हें जो मेरा पूर्व रूप देखना है, वह संभव नहीं है।

  • पांडवों के युद्ध जीतने के बाद कब तक उनके साथ रहे हनुमान, उसके बाद क्या हुआ?
    +6और स्लाइड देखें

    जब हनुमानजी ने भीम को दिखाया अपना विशाल रूप
    हनुमानजी की बात सुनकर भीम बोले- आपके उस विशाल रूप को देखे बिना मैं यहां से नहीं जाऊंगा। यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा है तो मुझे उस रूप में दर्शन दीजिए।
    भीम के इस प्रकार कहने पर हनुमानजी ने अपना विशाल रूप दिखाया, जो उन्होंने समुद्र लांघते समय धारण किया था। हनुमानजी के उस रूप के सामने वह केलों का बगीचा भी ढंक गया। भीमसेन अपने भाई का यह रूप देखकर आश्चर्यचकित हो गए।
    फिर भीम ने कहा- हनुमानजी। मैंने आपके इस विशाल रूप को देख लिया है। अब आप अपने इस स्वरूप को समेट लीजिए। आप तो उगते हुए सूर्य के समान हैं, मैं आपकी ओर देख नहीं सकता।
    भीम के ऐसा कहने पर हनुमानजी अपने मूल स्वरूप में आ गए और उन्होंने भीम को अपने गले से लगा लिया। इससे तुरंत ही भीम की सारी थकावट दूर हो गई और सब प्रकार की अनुकूलता का अनुभव होने लगा।

  • पांडवों के युद्ध जीतने के बाद कब तक उनके साथ रहे हनुमान, उसके बाद क्या हुआ?
    +6और स्लाइड देखें

    हनुमानजी ने भीम को दिया था ये वरदान
    गले लगाने के बाद हनुमानजी ने भीम से कहा कि- भैया भीम। अब तुम जाओ, मैं इस स्थान पर रहता हूं- यह बात किसी से मत कहना। भाई होने के नाते तुम मुझसे कोई वर मांगो। तुम्हारी इच्छा हो तो मैं हस्तिनापुर में जाकर धृतराष्ट्र पुत्रों को मार डालूं या पत्थरों से उस नगर को नष्ट कर दूं अथवा दुर्योधन को बांधकर तुम्हारे पास ले आऊं। तुम्हारी जैसी इच्छा हो, उसे मैं पूरी कर सकता हूं।
    हनुमानजी की बात सुनकर भीम बड़े प्रसन्न हुए और बोले- हे वानरराज। आपका मंगल हो। आपने जो कहा है वह काम तो होकर ही रहेगा। बस, आपकी दयादृष्टि बनी रहे- यही मैं चाहता हूं।
    भीम के ऐसा कहने पर हनुमानजी ने कहा- भाई होने के नाते मैं तुम्हारा प्रिय करूंगा। जिस समय तुम शत्रु सेना में घुसकर सिंहनाद करोगे, उस समय मैं अपने शब्दों से तुम्हारी गर्जना को बढ़ा दूंगा तथा अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठा हुआ ऐसी भीषण गर्जना करुंगा, जिससे शत्रुओं के प्राण सूख जाएंगे और तुम उन्हें आसानी से मार सकोगे। ऐसा कहकर हनुमानजी ने भीमसेन को मार्ग दिखाया और वहां से चले गए।

आगे की स्लाइड्स देखने के लिए क्लिक करें
दैनिक भास्कर पर Hindi News पढ़िए और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट | Hindi Samachar अपने मोबाइल पर पढ़ने के लिए डाउनलोड करें Hindi News App, या फिर 2G नेटवर्क के लिए हमारा Dainik Bhaskar Lite App.
Web Title: Hanuman Jayanti 2018, Hanuman S Intersting Stories,
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

Trending

Top
×