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सभी पैरेंट्स को जाननी चाहिए श्रीकृष्ण के बचपन की ये 6 बातें, अपने बच्चों दे पाएंगे बेहतर जिंदगी

नौकरीपेशा पैरेंट्स के लिए ये परेशानी होती है कि कैसे कम समय में बच्चों को बेहतर जिंदगी दे सकें।

यूटिलिटी डेस्क | Last Modified - Feb 12, 2018, 05:00 PM IST

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    पैरेंटिंग एक मुश्किल टॉस्क है। नौकरीपेशा पैरेंट्स के लिए ये परेशानी होती है कि कैसे कम समय में बच्चों को बेहतर जिंदगी दे पाएं। कई बार बच्चों को बराबर समय नहीं देने के कारण वो परिवार से दूर, जिद्दी और गैर-जिम्मेदार हो जाते हैं। हमारे ग्रंथों ने ऐसी सारी समस्याओं के समाधान अवतारों की कहानियों में दिए हैं। बस उन्हें उस तरह से देखने की जरूरत है। महानगरों की दौड़भाग वाली जिंदगी पैरेंटिंग को और चैलेंजिंग बना देती है। सीधा तरीका है, बच्चों पर बहुत ज्यादा दबाव बनाने या उन्हें खुली छूट देने, दोनों ही तरीकों से उनका भविष्य बिगड़ सकता है।

    बच्चों को बेहतर परवरिश और अच्छा इंसान बनाने के लिए सभी पैरेंट्स को भगवान कृष्ण के बचपन की घटनाओं को समझना चाहिए। ये आपको पैरेंटिंग की बेहतर सीख दे सकती है….

    माखन-मिश्री यानी हेल्दी फूड

    बचपन में खानपान अच्छा ना हो तो शरीर कमजोर रह जाता है। कमजोर शरीर से कभी सफलता नहीं पाई जा सकती। भगवान कृष्ण को आज भी माखन-मिश्री का भोग लगता है। माखन-मिश्री प्रतीक है हेल्दी फूड का। अपने बच्चों को हमेशा ऐसा खाना दें जो उसके शारीरिक विकास में सहायक हो।

    सजा में भी प्रेम दिखे

    अक्सर पैरेंट्स बच्चों की गलती पर ऐसे रिएक्ट करते हैं या इस तरह से उनको सजा देते हैं कि बच्चा मन ही मन उनसे दूर होने लगता है। कभी भी बच्चों को ऐसे सजा ना दें जो उनको भीतर से तोड़ दे या आपसे दूर करे। बच्चों को दी जाने वाली सजा में भी प्रेम झलकना चाहिए। जैसे यशोदा ने कृष्ण को उनकी शरारतों से तंग आकर बांधा या मारने भी दौड़ी तो कृष्ण को होने वाली परेशानी उनके चेहरे पर छलकीं। भागवत में इसका वर्णन है कि यशोदा ने जब भी कान्हा को सजा दी, वे भी रोईं। इससे उनका संबंध और भी गहरा हुआ, आपसी प्रेम प्रगाढ़ हुआ।

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    घर की जिम्मेदारी लेना भी सिखाएं

    कृष्ण पांच साल के थे, तब वे अपने घर की गाएं चराने बाकी ग्वालों के साथ जंगल में जाते थे। नंद ग्वालों के राजा था। गौ पालन उनके घर की आर्थिक स्थिति का आधार था। बचपन से ही कृष्ण को ये सिखाया गया, गौओं के बीच रहना, उनका व्यवहार समझना और अपने परिवार के आर्थिक आधार को समझना ये उन्होंने बचपन में ही सीख लिया। अक्सर माता-पिता बच्चों को लंबे समय तक परिवार के व्यवसाय से दूर रखते हैं, ऐसे में वे बड़े होकर उसमें रम नहीं पाते। अगर बचपन से उन्हें ऐसा माहौल दिया जाए तो वे बड़े होने पर जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से संभालने के लायक बनेंगे।

    आउटडोर गेम्स पर करें फोकस

    आज के दौर की सबसे बड़ी समस्या है बच्चे वीडियो गेम्स में उलझकर रह गए हैं। आउटडोर गेम्स या शारीरिक श्रम लगभग खत्म सा हो गया है। श्री कृष्ण का बचपन देखेंगे तो पाएंगे कि वो अपने दोस्तों के साथ जंगलों और गांव में खेलते थे। इससे तीन फायदे होते, एक तो उनमें लीडरशीप के गुण आते, दूसरा वे अपनी परेशानियों पर खुद फैसला लेना सिखते हैं और तीसरा शारीरिक श्रम से उनका शरीर स्वस्थ्य रहता है।

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    संस्कार और संस्कृति को निकट से महसूस करें

    आज के बच्चे अपने ही संस्कार और सस्कृति को समझ नहीं पाते हैं क्योंकि उनको घर में वैसा माहौल नहीं मिल पाता। अगर हम शुरू से उनको अपनी संस्कृति, व्रतों, उत्सवों में रमा दें तो वे हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे। महानगरीय संस्कृति में इंसान अपने परिवार और पूर्वजों के संस्कारों को भूल जाता है। जो उसे परिवार से अलग कर देते हैं। अगर बच्चों को परिवार से जोड़े रखना है तो उनको अपनी संस्कृति और संस्कारों के साथ पालें।

    प्रकृति के निकट रखें

    बच्चे में अगर संवेदनशीलता लानी है तो उसे प्रकृति के निकट रहने का मौका दें। बच्चा जितने बेहतर तरीके से प्रकृति को समझ पाएगा, उसे महसूस कर पाएगा उतना ही ज्यादा वो संवेदनशील होगा। कृष्ण का बचपन गांव की गलियों, जंगलों, यमुना किनारे और गायों के बीच बीता। वे प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए आगे आए। उनमें मानव और प्रकृति दोनों के प्रति एक जैसी संवेदनशीलता थी। अगर बच्चे में संवेदनशीलता नहीं होगी तो वो कभी दूसरों की मदद के लिए आगे नहीं आएगा, ना ही अपने परिवार के साथ तालमेल बैठा पाएगा।

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