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यहां शिव बने थे बैल, विष्णु बच्चा बने, लक्ष्मी बनी थी बेर का पेड़

बहुत रोचक और दिलचस्प कहानियां है भारत के इन प्रमुख तीर्थों की।

धर्म डेस्क. उज्जैन | Last Modified - Jul 12, 2018, 03:33 PM IST

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    रिलिजन डेस्क. उत्तराखंड में आई भीषण तबाही से वहां के चार धाम की यात्रा रुक गई है। हजारों तीर्थ यात्री पहाड़ी रास्तों में फंसे हुए हैं। उत्तराखंड में भारत के प्रमुख चारधामों में से एक बद्रीनाथ, 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक केदार नाथ, गंगा का उद्गम स्थल गंगोत्री और एक और तीर्थ यमुनोत्री हैं। ये चारों तीर्थ दुर्गम पहाड़ियों में बसे हैं फिर भी हर साल लाखों लोग इनके दर्शन के लिए जाते हैं। आइए हम आपको बताते हैं कि बद्रीनाथ और केदारनाथ तीर्थ का इतना अधिक महत्व क्यों हैं।

    इन दोनों पवित्र चार धामों की ऊंचाई लगभग 3000 मीटर है। चार धामों की यात्रा की शुरुआत प्रमुख रुप से तीर्थ नगरी हरिद्वार से गंगा स्नान के साथ होती है। यहां से चार धामों की यात्रा का दायरा लगभग 1500 किलोमीटर है। हालांकि वर्तमान में टिहरी बांध के निर्माण के बाद से यमुनोत्री और गंगोत्री धाम की दूरी लगभग 20 से 25 किलोमीटर ज्यादा हुई है। किंतु पूर्व की तुलना में यमुनोत्री तक पहुंचने का सड़क मार्ग अब लगभग 10 किलोमीटर कम हो गया है।
    पहले जहां बस या निजी वाहन हनुमान चट्टी तक ही पहुंच पाते थे, किंतु सड़क निर्माण के बाद यह जानकी चट्टी तक चले जाते हैं। जिससे अब यात्रा में अब लगभग चार या पांच किलोमीटर ही पैदल चलना होता है, जो पूर्व मे लगभग 15 किलोमीटर तक पैदल मार्ग था। इसके कारण चार धाम की यात्रा में भी एक या दो दिन की बचत हो जाती है। गंगोत्री तक भी सड़क मार्ग बना है। केदारनाथ की यात्रा की शुरुआत गौरीकुंड से होती है। यह यात्रा लगभग 15 से 20 किलोमीटर की पैदल यात्रा है। बद्रीनाथ धाम की यात्रा तुलनात्मक रुप से सुविधाजनक है।
    जानिए केदारनाथ और बद्रीनाथ तीर्थ की रोचक कहानियां अगली स्लाइड्स में...
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    केदार नाथ की कथा ....
    महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव कौरवों की हत्या ( भाइयों की हत्या) के पाप से मुक्त होना चाहते थे। वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन शिव उन लोगों से रुष्ट थे।
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    भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव हिमालय तक आ पहुंचें। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार क्षेत्र में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए।

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    भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शिवजी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में समाने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया।

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    भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं।

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    बद्रीनाथ धाम की कथा
    नील कंठ पर्वत के समीप भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतरण किया। ये जगह पहले शिव भूमि (केदार भूमि) के रूप में प्रचलित थी। भगवान् विष्णु जी ध्यान के लिए जगह खोज रहे थे। उन्हें अलकनंदा के पास की यह भूमि पसंद आई। वे अलकनंदा नदी के संगम के समीप रोने करने लगे। उनका रुदन सुन कर पार्वती का मन द्रवित हो गया। वो और शिव जी उस बालक के समीप गए। उन से पूछा की बालक तुम्हें क्या चहिए? तो बालक ने ध्यान करने के लिए वो जगह मांग ली। इस तरह से रूप बदल कर भगवान विष्णु ने शिव-पार्वती से वो जगह अपने ध्यान योग हेतु प्राप्त की।
    जब भगवान विष्णु योग ध्यान मुद्रा में थे तो पहाड़ों पर बर्फ गिरने लगी।
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    भगवान विष्णु बर्फ में पूरी तरह दब चुके थे। उनकी इस दशा को देखकर माता लक्ष्मी का उनके पास खड़े हो कर एक बेर (बद्री) के वृक्ष का रूप ले लिया और सारा बर्फ को अपने ऊपर सहने लगीं। भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और बर्फ से बचाने लगीं। कई वर्षों बाद जब भगवान् विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा की माता लक्ष्मी बर्फ से ढकी पड़ी हैं। उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा कि हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है सो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा। तुमने मेरी रक्षा बद्री रूप में की है तो आज से मुझे बद्री के नाथ- बद्रीनाथ के नाम से जाना जायेगा। इस तरह से भगवान विष्णु का नाम बद्रीनाथ पड़ा।
    जहाँ भगवान बद्री ने तप किया तह वो ही जगह आज तप्त कुण्ड के नाम से जानि जाती है और उनके तप के रूप में आज भी उस कुण्ड में हर मौसम में गर्म पानी उपलब्ध रहता है।
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    पौराणिक मान्यताओं में बद्रीनाथ की स्थापना सतयुग में मानी जाती है। वेदों में भी बद्रीकाश्रम का वर्णन आया है। मंदिर में वर्तमान में स्थापित भगवान विष्णु की मूर्ति को आठवीं सदी में आदिगुरु शंकराचार्य ने नारदकुंड से निकालकर तप्तकुंड के पास गरुड़ गुफा में बद्रीविशाल के रूप में प्रतिष्ठित किया था।
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    बद्रीनाथ धाम में कपाट खुलते मंदिर में प्रज्जवलित अखण्ड ज्योति के दर्शन का विशेष महत्व है। यह अखण्ड ज्योति साल भर लगातार प्रज्जवलित रहती है यानी कपाट बंद रहने के दौरान ठंडे मौसम में भी यह जलती है। श्रद्धालु इस अखण्ड ज्योति को भगवत कृपा और आशीर्वाद मानते हैं। क्योंकि मान्यता है कि कपाट बंद होने के बाद भगवान ब्रद्रीनाथ योग मुद्रा में जाते हैं और देवताओं द्वारा उनकी पूजा की जाती है।

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    इस मंदिर का निर्माण कत्यूरी शैली में कराया गया है। मंदिर का शिखर 6 फीट ऊंचा है। गर्भगृह के आसपास प्रदक्षिणा करने के लिए पत्थर का मंडप बनवाया गया है। यहीं भक्त फूल और घी से पूजा करते हैं।

    (तस्वीरें साभार - फेसबुक)

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    य़ही केदारनाथ में अखंड दीप में घी का दान करने का विशेष महत्व है और केदारनाथ भगवान की घी से पूजा करने से जीवन में कभी मुश्किलों का सामना करना नहीं पड़ता है। ऐसा भी कहा जाता है कि यहीं शिवजी के साथ भैरव बिराजमान हैं, दोनों की पूजा करने से ग्रह दोष दूर हो जाता हैं।
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    सुबह सात बजे मंदिर का द्वार खुलता है और दोपहर एक से दो बजे के बीच विशेष पूजा होती है। शाम साढ़े सात बजे शिवजी की सिंगार आरती होती है। यहां की आरती प्रसिद्ध है, लोग माथे पर लाल चुन्नी या लाल गमछा बांध के कुंकं-चंदन का तिलक कर हर हर महादेव के नाद के साथ शिवजी की भक्ति में लिन हो जाते हैं।
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    इस वक्त हिमालय के अलग-अलग स्थानों की यात्रा कर चुके ऊना, गुजरात के रजनीकांतभाई भट्ट केदार मंदिर के दर्शन के लिए गए थे। उनका मानना है कि मंदिर के दर्शन से एक अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है। ईश्वर के सानिध्य के साथ काल के काल महाकाल महामृत्यु के देवता आप को आनंदपूर्वक मानो जीवन का अलौकिक दान देते हैं।
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    गुजरात के कमलेश पटेल और रेखा पटेल एक सप्ताह पहले ही केदारनाथ की यात्रा पर गये थे तो उन्होने बताया कि वहां जो धन्यता का अनुभव होता है वो वाकय अपने आप में अमूल्य होता है। हमारी यात्रा निर्विघ्न पूर्ण हुई, वो शिवजी का सांकेतिक आशीर्वाद ही है।
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    2008 में केदारनाथ की यात्रा करने वाली गुजरात के मिनिताबेन दवे का कहना है कि कुदरत के करिश्मे का वहां जवाब नहीं है। उपनिषद में जिसे अनिर्वचनीय कहा गया है, उसी परमतत्व का वहां अनुभव होता है। महादेव के सानिध्य में मुझे लगा कि बस यहीं बैठे रहें।

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