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काम की बात: आप भले ही कुछ भी न करें पर ये याद रखें

डॉ. विजय अग्रवाल | Jan 05, 2013, 15:31 PM IST

काम की बात: आप भले ही कुछ भी न करें पर ये याद रखें
प्रकृति भी अपने आप में विचित्र है। राम राजगद्दी से छुटकारा पाना चाहते हैं, लेकिन राजगद्दी उन्हें नहीं छोडऩा चाहती। राम के पीछे-पीछे वैसे ही भागती है, जैसे कि शरीर के पीछे परछाई। राम वन को चले गए हैं। सोच रहे होंगे कि पीछा छूटा। लेकिन पीछा छूटा कहां। भरत चल दिए राजगद्दी को लेकर राम के पीछे-पीछे। भैया, लो सम्भालो अपना ये जंजाल। मुझसे नहीं संभलने वाला राम के बहुत ही प्यारे थे भरत। इसलिए राजसिंहासन और आत्मग्लानि के बोझ तले दबे इस छोटे प्रिय भाई पर उन्हें दया आनी चाहिए थी।
लेकिन नहीं आई। हालांकि डांटा तो नहीं राम ने उन्हें कि ये तुमने राजसिंहासन का फालूदा क्या बना रखा है। यह कोई यूं ही बच्चों का खिलौना है कि बस्ते में डालकर कहीं भी घूम रहे हो। उसकी अपनी एक पवित्रता है। राजपुत्र होने के बावजूद तुम्हे समझ नहीं हैं मूर्ख। जा अब यहां से जा और मूर्खता न कर। हो गई बहुत भावुकता। मैं तुम्हारी भावुकता की इस नदी-वदी में बहने वाला नहीं हूं। ऐसी कोई नाराजगी नहीं दिखाई राम ने। बल्कि पूरे इत्मीनान से संतुलन के साथ भरत को समझाया और इस समझाने का केंद्र रहा पिता कि आज्ञा का पालन करने का धर्म पहले तो यही कहा कि पिता की आज्ञा ही आज्ञा होती है। फिर चाहे वह उचित हो या अनुचित। अलग-अलग तरीके से उलट-पलटकर उन्होंने यहां भरत को ऐसा घेरा कि भरत के पास पूछने को कुछ नहीं रहा।
राम ने उन्हें बोलने का मौका तक नहीं दिया। राम ने राज्य के उत्तराधिकारी ज्येष्ठ पुत्र के होने के सिद्धांत को एक ओर हटाकर अपने पिता के आज्ञा का पालन किया। तभी तो यहां राम कह रहे हैं कि यह वेद में प्रसिद्ध है और सभी शास्त्रों की सम्मति भी यही है कि राजतिलक उसी का होता है जिसे पिता देता है। इस तरह राम ने राजगद्दी को ठुकरा दिया। भरत ने अनेक विकल्प सुझाए लेकिन राम ने सिर्फ वन जाने का फैसला लिया। राम मानने वाले नहीं थे। वे तो केवल सुन रहे थे, ताकि भरत को कहीं यह न लगे कि मुझे सुना ही नहीं गया। आप करें कुछ भी नहीं, केवल सुन भर लें, तो लगभग आधा करना तो हो ही जाता है।
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Web Title: granth: To the point: even if you do nothing, they remember
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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