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राम जानते थे वनवास जाने के ये चार फायदे

विजयकुमार अग्रवाल | Jan 03, 2013, 14:49 PM IST

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राम को वन जाना था। वहां चौदह साल रहना था। फिर अयोध्या वापस लौटना था। यदि उन्होंने स्वयं को यहीं तक सीमित कर लिया होता, तो उनका वन उनके लिए कानन बन गया होता। आखिर वन में ऋषि मुनियों के आश्रम तो थे ही और वहां जाकर रहने की राम को कोई मनाही भी नहीं थी। राम वहां रहे थे, भले ही कुछ-कुछ दिनों के लिए ही रहे हों। बल्कि जब निषादराज जैसे शासक उन्हें अपने नगर में चलने को कहते हैं या नगर में जाकर सुग्रीव और विभीषण का राजतिलक किए जाने की बात आती है तो वे इसके लिए लक्ष्मण को भेजते हैं। स्वयं नहीं जाते, क्योंकि उनके लिए नगर में प्रवेश करना वर्जित था। वैसे भी अयोध्या से वन में पहुंचने के बाद राम ने एक पर्णकुटी का वर्णन इन शब्दों में किया है। इस पर्णकुटी में राम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी के साथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे कि अमरावती में इन्द्र अपनी पत्नी रती और पुत्र जयन्त के साथ रहता है।
कोई दिक्कत नहीं थी यहां राम को। लेकिन जब होने लगी तो एक दिन सब छोड़-छोड़कर आगे बढ़ लिए। जाहिर है कि हालांकि उन्हें दिया तो गया था वन का वास लेकिन उन्होंने ने इसे वन का गमन बना लिया। एक ही जगह पर बस जाने की बजाए चलते रहने का फैसला किया। राम ने कैकयी के सामने वनवास जाने के चार फायदे गिनाए हैं। पहला तो यह कि मैं पिता की आज्ञा का पालन करके खुद को सौभाग्यशाली कहलाऊंगा। दूसरा यह कि वन में जाने से मैं मुनियों से मिल सकूंगा, जिससे कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। तीसरे यह कि इससे मुझे माता की आज्ञा का पालन करने का सुख और संतोष मिलेगा। चौथा प्राणों से प्रिय मेरे भाई भरत को रामगद्दी मिलेगी।
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Web Title: granth: These four advantages to exile Rama knew
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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