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पांच तरह की होती है वाणी, हर वाणी में होता है सत्य

जीवन मंत्र | Jan 16, 2014, 09:04 AM IST

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सत्य बहुधा वाणी में ही प्रतिष्ठित माना गया है और वाणी पांच प्रकार की होती है। ब्रह्म वाणी, देव वाणी, वेद वाणी, आत्म वाणी और गुरुवाणी। ब्रह्म वाणी परम शून्य, परम विस्तार से निकली है, जो महात्मा ही सुन सकते हैं। देववाणी या दिव्य वाणी ब्रह्मवाणी से थोड़ा नीचे है इसे भी सुनना आम जनता के वश में नहीं है।
वेद वाणी अपने-अपने शास्त्रों की वाणी है, इसे पढ़ना और समझना कठिन है। आत्मवाणी मनुष्य की सबसे करीबी वाणी है, क्योंकि वह उसकी अंतरात्मा की आवाज है, परंतु वह आज के दौर में कपटों से ढक गई है तथा उसे सुनना मुश्किल है। गुरुवाणी उक्त वाणियों से सर्वश्रेष्ठ वाणी है, परंतु इसका श्रवण गुरु से ही करना चाहिए।
शंकराचार्य ने ब्रह्म को सत्य कहा है तथा कैलाशपति गौरीशंकर ने भजन को सत्य कहा है। भजन कई प्रकार के होते हैं और कालांतर में महापुरुषों ने हरि नाम को ही सत्य मान लिया। परिस्थितियां और कामनाएं मनुष्य को झूठ बोलने पर विवश करती हैं, परंतु वास्तविक मनुष्य के अंतःकरण में सत्य ही विराजमान होता है। उन्होंने सुनने को भी कई भागों में बांट कर उपस्थित श्रोताओं को इसके बारे में बताया।
संसार में सत्य के समान कोई धर्म नहीं है। सत्य की राह पर चलकर ही धर्म का आचरण संभव है। सत्य ही पुण्य की जड़ है। बीज अपनी हस्ती मिटाकर ही वृक्ष का रूप धारण करता है।
धर्म ही मानव जीवन के लिए एक प्रकाश का पुंज है। धन के लालच से दूर रहने की शिक्षा देते हुए कहा कि धन हो या न हो दोनों ही परिस्थितियों में मानव को तनाव पैदा करता है। धन के कारण ही भ्रष्टाचार पैदा होता है। इसलिए भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए धन का लालच दूर करना होगा।
पूज्य मुरारी बापू की कथा से....
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Web Title: Morari Bapu katha in hindi
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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