Home» Jeevan Mantra » Hindu Gods» Shani Dev

Shanidev: आरतियां, मंत्र, स्तुतियां, पूजन विधि, व्रत कथा

Religion Bhaskar | Nov 10, 2016, 18:16 IST

Shanidev: आरतियां, मंत्र, स्तुतियां, पूजन विधि, व्रत कथा

Shanidev: आरतियां, मंत्र, स्तुतियां, पूजन विधि, व्रत कथा

धर्म ग्रंथों में शनिदेव को न्यायाधीश कहा गया है। यानी मनुष्यों को उनके अच्छे-बुरे कामों का फल शनिदेव ही प्रदान करते हैं। शनि देव गिद्ध पर सवार रहते हैं। इनके हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल रहता है। ये सूर्य व छाया के पुत्र हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार, शनिदेव का जन्म ज्येष्ठ माह की अमावस्या को हुआ था। इस दिन शनि जयंती का पर्व मनाया जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, शनिदेव के देखने के कारण भगवान श्रीगणेश का सिर कट गया था। शनिदेव भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त माना जाते हैं। मान्यता है कि हनुमानजी की पूजा करने से भी शनिदेव प्रसन्न होते हैं व उनके भक्तों को कष्ट नहीं देते।

Shani Dev : आरतियां

श्री शनि देव की आरती

आरती का अर्थ है पूरी श्रद्धा के साथ परमात्मा की भक्ति में डूब जाना। भगवान को प्रसन्न करना। इसमें परमात्मा में लीन होकर भक्त अपने देव की सारी बलाए स्वयं पर ले लेता है और भगवान को स्वतन्त्र होने का अहसास कराता है। आरती को नीराजन भी कहा जाता है। नीराजन का अर्थ है विशेष रूप से प्रकाशित करना। यानी कि देव पूजन से प्राप्त होने वाली सकारात्मक शक्ति हमारे मन को प्रकाशित कर दें। व्यक्तित्व को उज्जवल कर दें। बिना मंत्र के किए गए पूजन में भी आरती कर लेने से पूर्णता आ जाती है। आरती पूरे घर को प्रकाशमान कर देती है, जिससे कई नकारात्मक शक्तियां घर से दूर हो जाती हैं। जीवन में सुख-समृद्धि के द्वार खुलते हैं। शनिदेव की आरती जय जय जय श्री शनि देव भक्तन हितकारी सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी जय जय जय शनि देव। श्याम अंक वक्र-दृष्टि चतुर्भुजाधारी, नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी। जय जय जय शनि देव। किरीट मुकुट शीश सहज दीपत है लिलारी मुक्तन की माल गले शोभित बलिहारी। जय जय जय शनि देव। मोदक और मिष्ठान चढ़े, चढ़ती पान सुपारी लोहा, तिल, तेल, उड़द, महिष है अति प्यारी। जय जय जय शनि देव। देव दनुज ऋषि मुनि सुरत और नर नारी विश्वनाथ धरत ध्यान हम हैं शरण तुम्हारी। जय जय जय शनि देव।

और पढ़ें

Shani Dev : मंत्र और स्तुतियां

श्री शनि चालीसा

श्री शनि चालीसा ।। चौपाई।। जयति जयति शनिदेव दयाला । करत सदा भक्तन प्रतिपाला।। चारि भुजा, तनु श्याम विराजै । माथे रतन मुकुट छवि छाजै।। परम विशाल मनोहर भाला । टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला।। कुण्डल श्रवण चमाचम चमके । हिये माल मुक्तन मणि दमके।। कर में गदा त्रिशूल कुठारा । पल बिच करैं आरिहिं संहारा।। पिंगल, कृष्णों, छाया, नन्दन । यम, कोणस्थ, रौद्र, दुख भंजन।। सौरी, मन्द, शनि, दश नामा । भानु पुत्र पूजहिं सब कामा।। जा पर प्रभु प्रसन्न है जाहीं । रंकहुं राव करैंक्षण माहीं।। पर्वतहू तृण होई निहारत । तृण हू को पर्वत करि डारत।। राज मिलत बन रामहिं दीन्हो । कैकेइहुं की मति हरि लीन्हों।। बनहूं में मृग कपट दिखाई । मातु जानकी गई चतुराई।। लखनहिं शक्ति विकल करि डारा । मचिगा दल में हाहाकारा।। रावण की गति-मति बौराई । रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई।। दियो कीट करि कंचन लंका । बजि बजरंग बीर की डंका।। नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा । चित्र मयूर निगलि गै हारा।। हार नौलाखा लाग्यो चोरी । हाथ पैर डरवायो तोरी।। भारी दशा निकृष्ट दिखायो । तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो।। विनय राग दीपक महं कीन्हों । तब प्रसन्न प्रभु है सुख दीन्हों।। हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी । आपहुं भरे डोम घर पानी।। तैसे नल परदशा सिरानी । भूंजी-मीन कूद गई पानी।। श्री शंकरहि गहयो जब जाई । पार्वती को सती कराई।। तनिक विलोकत ही करि रीसा । नभ उडि़ गयो गौरिसुत सीसा।। पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी । बची द्रौपदी होति उघारी।। कौरव के भी गति मति मारयो । युद्घ महाभारत करि डारयो।। रवि कहं मुख महं धरि तत्काला । लेकर कूदि परयो पाताला।। शेष देव-लखि विनती लाई । रवि को मुख ते दियो छुड़ई।। वाहन प्रभु के सात सुजाना । जग दिग्ज गर्दभ मृग स्वाना।। जम्बुक सिंह आदि नखधारी । सो फल जज्योतिष कहत पुकारी।। गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं । हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं।। गर्दभ हानि करै बहु काजा । गर्दभ सिद्घ कर राज समाजा।। जम्बुक बुद्घि नष्ट कर डारै । मृग दे कष्ट प्रण संहारै।। जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी । चोरी आदि होय डर भारी।। तैसहि चारि चरण यह नामा । स्वर्ण लौह चांजी अरु तामा।। लौह चरण पर जब प्रभु आवैं । धन जन सम्पत्ति नष्ट करावै।। समता ताम्र रजत शुभकारी । स्वर्ण सर्व सुख मंगल कारी।। जो यह शनि चरित्र नित गावै । कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै।। अदभुत नाथ दिखावैं लीला । करैं शत्रु के नशि बलि ढीला।। जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई । विधिवत शनि ग्रह शांति कराई।। पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत । दीप दान दै बहु सुख पावत।। कहत रामसुन्दर प्रभु दासा । शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा।। ।।दोहा।। पाठ शनिश्चर देव को, की हों विमल तैयार । करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार।।

और पढ़ें

Spiritual Quotes

  • नमस्कार करने वाला व्यक्ति विनम्रता को ग्रहण करता है और समाज में सभी के प्रेम का पात्र बन जाता है -प्रेमचंद

  • जो मानव अपने अवगुण और दूसरों के गुण देखता है, वही महान व्यक्ति बन सकता है - सुकरात

  • उस व्यक्ति ने अमरत्त्व प्राप्त कर लिया है, जो किसी सांसारिक वस्तु से व्याकुल नहीं होता - स्वामी विवेकानंद

  • वास्तव में वे ही पुरूष धीर हैं जिनका मन विकार उत्पन्न करने वाली परिस्थिति में भी विकृत नहीं होता - कालिदास

Trending Now

पाएं लेटेस्ट न्यूज़ एंड अपडेट्स

दैनिक भास्कर के ट्रेंडिंग खबरों के नोटिफिकेशन रखेंगे आपको अपडेट..

* किसी भी समय ब्राउजर सेटिंग्स बदलकर नोटिफिकेशंस ऑफ कर सकते हैं.
Top