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Lord Vishnu: आरतियां, मंत्र, स्तुतियां, पूजन विधि, व्रत कथा

Religion Bhaskar | Nov 22, 2016, 12:45 IST

Lord Vishnu: आरतियां, मंत्र, स्तुतियां, पूजन विधि, व्रत कथा

Lord Vishnu: आरतियां, मंत्र, स्तुतियां, पूजन विधि, व्रत कथा

हिंदू धर्म में पूजे जाने वाले त्रिदेवों में भगवान विष्णु भी एक हैं। जिस तरह भगवान ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता, शिव को सृष्टि का विनाशक कहा जाता है उसी तरह भगवान विष्णु को सृष्टि का पालन करने वाला माना गया है। भगवान विष्णु की पत्नी लक्ष्मी हैं। धर्म ग्रंथों में भगवान विष्णु का निवास क्षीरसागर बताया गया है। वे शेषनाग के ऊपर शयन करते हैं। उनकी नाभि से कमल उत्पन्न होता है जिसमें ब्रह्मा जी स्थित हैं। जब-जब संसार में पाप बढ़ता है भगवान विष्णु अवतार लेकर उसका नाश करते हैं। श्रीमद्भागवत में भगवान विष्णु के 24 अवतार बताए गए हैं, लेकिन उनमें से 10 अवतार ही प्रमुख माने जाते हैं।

Lord Vishnu : आरतियां

श्री विष्णु की आरती

आरती का अर्थ है पूरी श्रद्धा के साथ परमात्मा की भक्ति में डूब जाना। भगवान को प्रसन्न करना। इसमें परमात्मा में लीन होकर भक्त अपने देव की सारी बलाए स्वयं पर ले लेता है और भगवान को स्वतन्त्र होने का अहसास कराता है। आरती को नीराजन भी कहा जाता है। नीराजन का अर्थ है विशेष रूप से प्रकाशित करना। यानी किदेव पूजन से प्राप्त होने वाली सकारात्मक शक्ति हमारे मन को प्रकाशित कर दें। व्यक्तित्व को उज्जवल कर दें। बिना मंत्र के किए गए पूजन में भी आरती कर लेने से पूर्णता आ जाती है। आरती पूरे घर को प्रकाशमान कर देती है, जिससे कई नकारात्मक शक्तियां घर से दूर हो जाती हैं। जीवन में सुख-समृद्धि के द्वार खुलते हैं। श्री विष्णु की आरती ऊँ जय जगदीश हरे, प्रभु जय जगदीश हरे। भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे।। ऊँ जय जगदीश हरे। जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मनका। सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तनका।। ऊँ जय जगदीश हरे। मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैंकिसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी।। ऊँ जय जगदीश हरे। तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी।। ऊँ जय जगदीश हरे। तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता।। ऊँ जय जगदीश हरे। तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। किस विधि मिलू दयामय, तुमको मैं कुमति ।। ऊँ जय जगदीश हरे। दीनबन्धु, दुखहर्ता ठाकुर तुम मेरे। अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे।। ऊँ जय जगदीश हरे। विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा।। ऊँ जय जगदीश हरे। ऊँ जय जगदीश हरे, प्रभु जय जगदीश हरे। भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे।। ऊँ जय जगदीश हरे।

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Lord Vishnu : पूजन की विधि

श्री विष्णु पूजन की सरल विधि

सामग्री देव मूर्ति के स्नान के लिए तांबे का पात्र, तांबे का लोटा, जल का कलश, दूध, देव मूर्ति को अर्पित किए जाने वाले वस्त्र व आभूषण। चावल, कुमकुम, दीपक, तेल, रुई, धूपबत्ती, फूल, अष्टगंध। तुलसीदल, तिल, जनेऊ। फल, दूध, मिठाई, नारियल, पंचामृत, सूखे मेवे, शक्कर, पान, दक्षिणा । सकंल्प किसी विशेष मनोकामना के पूरी होने की इच्छा से किए जाने वाले पूजन में संकल्प की जरूरतहोती है। निष्काम भक्ति बिना संकल्प के भी की जा सकती है। पूजन शुरूकरने से पहले सकंल्प लें। संकल्प करने से पहले हाथों मेंजल, फूल व चावल लें। सकंल्प में जिस दिन पूजन कर रहे हैं उस वर्ष, उस वार, तिथि उस जगह और अपने नाम को लेकर अपनी इच्छा बोलें। अब हाथों में लिए गए जल को जमीन पर छोड़ दें। संकल्प का उदाहरण जैसे 21/4/2015 को श्री विष्णु का पूजन किया जाना है। तो इस प्रकार संकल्प लें। मैं ( अपना नाम बोलें) विक्रम संवत् 2072 को वैशाख मास के तृतीया तिथि को मंगलवार के दिन, कृतिका नक्षत्र में, भारत देश के मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन शहर में महाकालेश्वर तीर्थ में इस मनोकामना से (मनोकामना बोलें) श्री विष्णु का पूजन कर रही/ रहा हूं। श्रीविष्णु पूजन की सरल विधि सर्वप्रथम गणेश पूजन करें। गणेश जी को स्नान कराएं। वस्त्र अर्पित करें। गंध, पुष्प, अक्षत से पूजन करें। अब भगवान विष्णु का पूजन शुरूकरें। भगवान विष्णु का आवाहन करें। आवाहन यानी कि बुलाना। भगवान विष्णु को अपने आसन दें। अब भगवान विष्णु को स्नान कराएं। स्नान पहले जल से फिर पंचामृत से और वापिस जल से स्नान कराएं। अब भगवान को वस्त्र पहनाएं। वस्त्रों के बाद आभूषण और फिर यज्ञोपवित (जनेऊ) पहनाएं। अब पुष्पमाला पहनाएं। सुगंधित इत्र अर्पित करें। अब तिलक करें। तिलक के लिए अष्टगंध का प्रयोग करें। अब धूप व दीप अर्पित करें। भगवान विष्णु को तुलसी दल विशेष प्रिय है। तुलसी दल अर्पित करें। भगवान विष्णु के पूजन में चावल का प्रयोग नहीं किया जाता है। तिल अर्पित कर सकते हैं। श्रद्धानुसार घी या तेल का दीपक लगाएं। आरती करें। आरती के पश्चात् परिक्रमा करें। अब नेवैद्य अर्पित करें। भगवान नारायण के पूजन के समय ‘‘ऊँ नमो नारायणाय मंत्र’’ का जप कर सकते है।

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Lord Vishnu : मंत्र और स्तुतियां

श्री विष्णु चालीसा

श्री विष्णु चालीसा ।। दोहा।। जै जै श्री जगत पति जगदाधार अनन्त । विश्वेश्वर अखिलेश अज सर्वेश्वर भगवन्त ।। ​।। चौपाई।। जै जै धरणीधर श्रुति सागर । जयति गदाधर सद्गुण आगर ।। श्री वसुदेव देवकी नंदन । वासुदेव नाशन भव फन्दन ।। नमो नमो सचराचर स्वामी । परंब्रह्म प्रभु नमो नमो नमामि ।। नमो नमो त्रिभुवन पति ईश । कमलापति केशव योगीश ।। गरुड़ध्वज अज भव भय हारी । मुरलीधर हरि मदन मुरारी ।। नारायण श्रीपति पुरुषोत्तम । पद्मनाभि नरहरि सर्वोत्तम ।। जै माधव मुकुन्द वनमाली । खल दल मर्दन दमन कुचाली ।। जै अगणित इन्द्रिय सारंगधर । विश्व रुप वामन आन्नद कर ।। जै जै लोकाध्यक्ष धनंजय । सहस्त्रज्ञ जगन्नाथ जयति जै ।। जै जै लोकाध्यक्ष धनंजय । सहस्त्रज्ञ जगन्नाथ जयति जै ।। जै मधुसूदन अनुपम आनन । जयति वायु वाहन वज्र कानन ।। जै गोविन्द जनार्दन देवा । शुभ फल लहत गहत तव सेवा ।। श्याम सरोरुह सम तन सोहत । दर्शन करत सुर नर मुनि मोहत ।। भाल विशाल मुकुट सिर साजत । उर वैजन्ती माल विराजत ।। तिरछी भृकुटि चाप जनु धारे । तिन तर नैन कमल अरुनारे ।। नासा चिबुक कपोल मनोहर । मृदु मुस्कान कुञ्ज अधरन पर ।। जनु मणि पंक्ति दशन मन भावन । बसन पीत तन परम सुहावन ।। रुप चतुर्भज भूषित भूषण । वरद हस्त मोचन भव दूषण ।। कंजारुन सम करतल सुन्दर । सुख समूह गुण मधुर समुन्दर ।। कर महँ लसित शंख अति प्यारा । सुभग शब्द जै देने हारा ।। रवि सम चक्र द्वितीय कर धारे । खल दल दानव सैन्य संहारे ।। तृतीय हस्त महँ गदा प्रकाशन । सदा ताप त्रय पाप विनाशन ।। पद्म चतुर्थ हाथ महँ धारे । चारि पदारथ देने हारे ।। वाहन गरुड़ मनोगतिवाना । तिहुँ त्यागत जन हित भगवाना ।। पहुँचि तहाँ पत राखत स्वामी । हो हरि सम भक्तन अनुरागी ।। धनि धनि महिमा अगम अन्नता । धन्य भक्तवत्सल भगवन्ता ।। जब सुरहिं असुर दुख दीन्हा । तब प्रकटि कष्ट हरि लीन्हा ।। सुर नर मुनि ब्रहमादि महेशू । सहि न सक्यो अति कठिन कलेशू ।। तब तहँ धरि बहुरुप निरन्तर । मर्द्यो दल दानवहि भयंकर ।। शय्या शेष सिन्धु बिच साजित । संग लक्ष्मी सदा विराजित ।। पूरन शक्ति धन्य धन खानी । आन्नद भक्ति भरणी सुख दानी ।। जासु विरद निगमागम गावत । शारद शेष पार नहीं पावत ।। रमा राधिका सिय सुख धामा । सोही विष्णु कृष्ण अरु रामा ।। अगणित रुप अनूप अपारा । निर्गुण सगण स्वरुप तुम्हारा ।। नहिं कछु भेद वेद अस भासत । भक्तन से नहिं अन्तर राखत ।। श्री प्रयाग दुवाँसा धामा । सुन्दरदास तिवारी ग्रामा ।। जग हित लागि तुम्हिं जगदीशा । निज मति रच्यो विष्णु चालीसा ।। जो चित्त दै नित पढ़त पढ़ावत । पूरन भक्त्ति शक्ति सरसावत ।। सुख वसत रुज ऋण नाशत । वैभव विकासत सुमति प्रकाशत ।। आवत सुख गावत श्रुति शारद । भाषन व्यास वचन ऋषि नारद ।। मिलत सुभग फल शोक नसावत । अन्त समय जन हरि पद पावत ।। दोहा - प्रेम सहित गहि ध्यान महँ हृदय बीच जगदीश । अर्पित शालिग्राम कहँ करि तुलसी नित शीश ।। क्षणभंगुर तनु जानि करि अहंकार परिहार । सार रुप ईश्वर लखै तजि असार संसार ।। सत्य शोध करि उर गहै एक ब्रह्म ओंकार । आत्मबोध होवै तबै मिलै मुक्त्ति के द्वार ।। शान्ति और सद्भाव कहँ जब उर फूलहिं फूल । चालिसा फल लहहिं जहँ रहहिं ईश अनुकूल ।। एक पाठ जन नित करै विष्णु देव चालीस । चार पदारथ नवहुँ निधि देय द्वारिकाधीश ।।

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Spiritual Quotes

  • किसी मूर्ख व्यक्ति के लिए किताबें उतनी ही उपयोगी हैं जितना कि एक अंधे व्यक्ति के लिए आईना। - चाणक्य

  • हम बाहरी दुनिया में कभी शांति नहीं पा सकते हैं, जब तक की हम अन्दर से शांत ना हों -दलाई लामा

  • कोई पाप है, तो वो यही है; ये कहना कि तुम निर्बल हो या अन्य निर्बल हैं। - स्वामी विवेकानंद

  • इस दुनिया में सम्मान से जीने का सबसे महान तरीका है कि हम वो बनें जो हम होने का दिखावा करते हैं - सुकरात

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