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Lord Shiva: आरतियां, मंत्र, स्तुतियां, पूजन विधि, व्रत कथा

Religion Bhaskar | Nov 10, 2016, 18:19 IST

Lord Shiva: आरतियां, मंत्र, स्तुतियां, पूजन विधि, व्रत कथा

Lord Shiva: आरतियां, मंत्र, स्तुतियां, पूजन विधि, व्रत कथा

शिव त्रिदेवों में सबसे प्रमुख हैं। देवी पार्वती इनकी पत्नी है। कार्तिकेय व श्रीगणेश इनके पुत्र हैं। एकमात्र शिव ही लिंग रूप में पूजे जाते हैं। शिव के गले में नाग देवता विराजित हैं और हाथों में डमरू और त्रिशूल लिए हुए हैं। कैलाश में उनका वास है। इन्हें महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव को संहार का देवता कहा जाता है। शिव का अर्थ है कल्याण करने वाला। समय-समय पर इन्होंने भी अनेक अवतार लिए हैं। हनुमान भगवान शिव के श्रेष्ठ अवतार माने जाते हैं। इनका वाहन नंदी है। गृहस्थ होते हुए भी इन्हें श्मशान में रहना प्रिय है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी (शिवरात्रि) पर इनकी पूजा मुख्य रूप से की जाती है।

Lord Shiva : आरतियां

शिव की आरती

आरती का अर्थ है पूरी श्रद्धा के साथ परमात्मा की भक्ति में डूब जाना। भगवान को प्रसन्न करना। इसमें परमात्मा में लीन होकर भक्त अपने देव की सारी बलाए स्वयं पर ले लेता है और भगवान को स्वतन्त्र होने का अहसास कराता है। आरती को नीराजन भी कहा जाता है। नीराजन का अर्थ है विशेष रूप से प्रकाशित करना। यानी कि देव पूजन से प्राप्त होने वाली सकारात्मक शक्ति हमारे मन को प्रकाशित कर दें। व्यक्तित्व को उज्जवल कर दें। बिना मंत्र के किए गए पूजन में भी आरती कर लेने से पूर्णता आ जाती है। आरती पूरे घर को प्रकाशमान कर देती है, जिससे कई नकारात्मक शक्तियां घर से दूर हो जाती हैं। जीवन में सुख-समृद्धि के द्वार खुलते हैं। भगवान शिव की आरती कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारं । सदा वसन्तं ह्रदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि।। ऊँ जय शिव ओंकारा स्वामी हर शिव ओंकारा। ब्रम्हा विष्णु सदाशिव अद्धांर्गी धारा।। ऊँ जय शिव ओंकारा...... एकानन चतुरानन पंचांनन राजे। हंसासंन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे।। ऊँ जय शिव ओंकारा...... दो भुज चार चतुर्भज दस भुज अति सोहे। तीनों रुप निरखता त्रिभुवन जन मोहे।। ऊँ जय शिव ओंकारा...... अक्षमाला, बनमाला, रुंडमालाधारी। चंदन मृदमग सोहे, भोले शशिधारी।। ऊँ जय शिव ओंकारा...... श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघाम्बर अंगे। सनकादिक, ब्रह्मादिक, भूतादिक संगे। ऊँ जय शिव ओंकारा...... कर मध्ये सुकमंडलु चक्र, त्रिशूल धरता। जगकरता, जगभरता, जगसंहारकरता ।। ऊँ जय शिव ओंकारा...... ब्रम्हा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रवणाक्षर मध्ये ये तीनों एका।। ऊँ जय शिव ओंकारा...... काशी में विश्वनाथ विराजत नंदीब्रह्मचारी नित उठी भोग लगावत महिमा अति भारी।। ऊँ जय शिव ओंकारा...... त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे।। ऊँ जय शिव ओंकारा..... जय शिव ओंकारा, स्वामी हर शिव ओंकारा। ब्रह्माविष्णु सदाशिव, अद्धांर्गी धारा। ऊँ जय शिव ओंकारा......

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Lord Shiva : पूजन की विधि

श्री शिव पार्वती पूजन की सरल विधि

सामग्री देव मूर्ति के स्नान के लिए तांबे का पात्र, तांबे का लोटा, जल का कलश, दूध, देव मूर्ति को अर्पित किए जाने वाले वस्त्र व आभूषण। चावल, अष्टगंध, दीपक, तेल, रुई, धूपबत्ती। चंदन, धतूरा, आक के फूल, बिल्वपत्र जनेऊ। प्रसाद के लिए फल, दूध, मिठाई, नारियल, पंचामृत, सूखे मेवे, शक्कर, पान, दक्षिणा में से जो भी हो। सकंल्प किसी विशेष मनोकामना के पूरी होने की इच्छा से किए जाने वाले पूजन में संकल्प की जरुरत होती है। निष्काम भक्ति बिना संकल्प के भी की जा सकती है। पूजन शुरू करने से पहले सकंल्प लें। संकल्प करने से पहले हाथों मेंजल, फूल व चावल लें। सकंल्प में जिस दिन पूजन कर रहे हैं उस वर्ष, उस वार, तिथि उस जगह और अपने नाम को लेकर अपनी इच्छा बोलें। अब हाथों में लिए गए जल को जमीन पर छोड़ दें। संकल्प का उदाहरण जैसे 21/4/2015 को श्री शिव- पार्वती का पूजन किया जाना है। तो इस प्रकार संकल्प लें। मैं ( अपना नाम बोलें ) विक्रम संवत् 2072 को, वैशाख मास के तृतीया तिथि को मंगलवार के दिन, कृतिका नक्षत्र में, भारत देश के मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन शहर में महाकाल तीर्थ में इस मनोकामना से (मनोकामना बोलें) श्री शिव-पार्वती का पूजन कर रही / रहा हूं। शिव- पार्वती पूजन की सरल विधि सर्वप्रथम गणेश पूजन करें। गणेश जी को स्नान कराएं। वस्त्र अर्पित करें। गंध, पुष्प, अक्षत से पूजन करें। अब देव मूर्ति में शिव-पार्वती पूजन करें। शिव-पार्वती को स्नान कराएं। स्नान पहले जल से फिर पंचामृत से और वापिस जल से स्नान कराएं। शिव-पार्वती को वस्त्र अर्पित करें। वस्त्रों के बाद फूलों के आभूषण पहनाएं। अब पुष्पमाला पहनाएं। अब तिलक करें। ‘‘ऊँ साम्ब शिवाय नमः’’ कहते हुए भगवान शिव को अष्टगंध का तिलक लगाएं। ‘‘ऊँ गौर्ये नमः’’ कहते हुए माता पार्वती को कुमकुम का तिलक लगाएं। अब धूप व दीप अर्पित करें। फूल अर्पित करें। श्रद्धानुसार घी या तेल का दीपक लगाएं। आरती करें। आरती के पश्चात् परिक्रमा करें। अब नेवैद्य अर्पित करें। भगवान शिव और पार्वती का बिल्व पत्र से पूजन करें। कनेर के पुष्प अर्पित करें। गौरी शंकर के पूजन के समय ‘‘ऊँ उमामहेश्वराभ्यां नमः’’ मंत्र का जप करते रहें।

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Lord Shiva : मंत्र और स्तुतियां

वेदसार शिवस्तवः स्तोत्र

वेदसार शिवस्तवः स्तोत्र वेदसार शिवस्तव भगवान शिव की स्तुति है। जिसे भगवान शिव की प्रसन्नता हेतु आदिगुरु शंकराचार्य ने लिखा है। इस स्तुति में भगवान शिव के द्वारा ही संसार की उत्पत्ति होना और फिर इस संसार के शिव में ही समाए जाने का वर्णन दिया गया है। शिव देवों के भी देव हैं, इसलिए महादेव हैं। जो देवताओं के भी दुःखों को दूर करें ऐसे हैं महादेव। महादेव होने के बाद भी जो बाघंबर लपेटे और भस्म रमाए फिरते हैं। तब भी देवी पार्वती के मन को मोहने वाले हैं, ऐसे शिव हैं। तीनों लोकों के हितों को ध्यान में रखते हुए न चखे जाने वाले विष को भी गले में रखे हुए हैं, ऐसे हमारे नीलकंठ हैं। प्रस्तुत हैं शिवस्तव जिसमे योगी के अनूठे रूपों का वर्णन दिया हुआ है। पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम्। जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम्।।1।। हे शिव! आप जो प्राणिमात्र के स्वामी एवं रक्षक हैं। पाप का नाश करने वाले परमेश्वर हैं। गजराज का चर्म धारण करने वाले हैं। श्रेष्ठ एवं वरण करने योग्य हैं। जिनकी जटाजूट में गंगा जी खेलती हैं। उन एक मात्र महादेव को बारम्बार स्मरण करता हूं। महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्। विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम ।। 2।। हे महेश्वर! सुरेश्वर, देवों के भी दुःखों का नाश करने वाले, विभुं विश्वनाथ विभुति धारण करने वाले हैं। सूर्य, चन्द्र एवं अग्नि आपके तीन नेत्र के सामान हैं। सदा आनन्द प्रदान करने वाले पंचमुख वाले महादेव मैं आपकी स्तुति करता हूं। गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्। भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्।। 3।। हे शिव आप जो कैलाशपति हैं। गणों के स्वामी, नीलकंठ हैं। धर्म स्वरूप वृष यानी कि बैल की सवारी करते हैं। अनगिनत गुण वाले हैं। संसार के आदि कारण हैं। प्रकाश पुञ सदृश्य हैं। भस्म अलंकृत हैं। जो भवानी के पति हैं। उन पञ्चमुख प्रभु को मैं भजता हूं। शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन्। त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूपः प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप।।4।। हे शिवाकांत पार्वती के मन को मोहने वाले! हे शम्भु! हे चन्द्रशेखर! हे महादेव! आप त्रिशूल एवं जटाजूट धारण करने वाले हैं। हे विश्वरूप! सिर्फ आप ही संपूर्ण जगत में व्याप्त हैं। हे पूर्णरूप आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों। परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम्। यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्।।5।। हे एकमात्र परमात्मा! जगत के आदिकारण! आप इच्छारहित, निराकार एवं ऊँकार स्वरूप वाले हैं। आपको सिर्फ प्राण (ध्यान) द्वारा ही जान जा सकता है। आपके द्वारा ही संपूर्ण श्रृष्टि की उत्पत्ति होती है। आप ही उसका पालन करते हैं तथा अंततः उसका आप में ही लय हो जाता है। हे प्रभु! मैं आपको भजता हूं। न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायु- र्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा। न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे।।6।। जो न भूमि हैं, न जल, न अग्नि, न वायु और न ही आकाश। अर्थात आप पंचतत्वों से परे हैं। आप तन्द्रा, निद्रा, ग्रीष्म एवं शीत से भी अलिप्त हैं। आप देश एव वेश की सीमा से भी परे हैं। हे निराकार त्रिमुर्ति! मैं आपकी स्तुति करता हूं। अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम्। तुरीयं तमःपारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम्।।7।। हे अजन्मे (अनादि) आप शाश्वत हैं। नित्य हैं। कारणों के भी कारण हैं। हे कल्यानमुर्ति शिव आप ही एक मात्र प्रकाशकों को भी प्रकाश प्रदान करने वाले हैं। आप तीनो अवस्ताओं से परे हैं। हे आनादि! अनंत आप जो कि अज्ञान से परे हैं। आपके उस परम् पावन अद्वैत स्वरूप को नमस्कार है। नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते। नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य।।8।। हे विभो! हे विश्वमूर्ते आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे सबको आनन्द प्रदान करने वाले सदानन्द आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे तपोयोग ज्ञान द्वारा प्राप्त्य आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे वेदज्ञान द्वारा प्राप्त्य प्रभु आपको नमस्कार है, नमस्कार है। प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शंभो महेश त्रिनेत्र। शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः।।9।। हे त्रिशूलधारी ! हे विभो विश्वनाथ ! हे महादेव ! हे शंभो ! हे महेश ! हे त्रिनेत्र ! हे पार्वतिवल्लभ ! हे शान्त ! हे स्मरणिय ! हे त्रिपुरारे ! आपके समक्ष न कोई श्रेष्ठ है। न वरण करने योग्य है। न मान्य है और न गणनीय ही है। शंभो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्। काशीपते करुणया जगदेतदेक- स्त्वंहंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि।।10।। हे शम्भो! हे महेश ! हे करूणामय ! हे शूलपाणे ! हे गौरीपति! हे पशुपति ! हे काशीपति ! आप ही सभी प्रकार के पशुपाश (मोह माया) का नाश करने वाले हैं। हे करूणामय आप ही इस जगत के उत्पत्ति, पालन एवं संहार के कारण हैं। आप ही इसके एकमात्र स्वामी हैं। त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ। त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन्।।11।। हे चराचर विश्वरूप प्रभु, आपके लिंगस्वरूप से ही सम्पुर्ण जगत अपने अस्तित्व में आता है (उसकी उत्पत्ति होती है), हे शंकर ! हे विश्वनाथ अस्तित्व में आने के उपरांत यह जगत आप में ही स्थित रहता है। अर्थात आप ही इसका पालन करते हैं। अंततः यह सम्पुर्ण श्रृष्टि आप में ही लय हो जाती है।

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  • सहिष्णुता के अभ्यास में, आपका शत्रु ही आपका सबसे अच्छा शिक्षक होता है - दलाई लामा

  • अपनी आँखों पर हाँथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है -स्वामी विवेकानंद

  • झूठे शब्द सिर्फ खुद में बुरे नहीं होते , बल्कि वो आपकी आत्मा को भी बुराई से संक्रमित कर देते हैं - सुकरात

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