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Lakshmi Mata: आरतियां, मंत्र, स्तुतियां, पूजन विधि, व्रत कथा

Religion Bhaskar | Nov 10, 2016, 18:10 IST

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Lakshmi Mata: आरतियां, मंत्र, स्तुतियां, पूजन विधि, व्रत कथा

Lakshmi Mata: आरतियां, मंत्र, स्तुतियां, पूजन विधि, व्रत कथा

देवी दुर्गा का ही एक रूप काली भी है। नवरात्र के सातवे दिन देवी के इस रूप की पूजा करने का विधान है। ये भगवती दुर्गा का काला और डरावना रूप हैं, जिसकी उत्पत्ति राक्षसों को मारने के लिये हुई थी। उनको ख़ासतौर पर बंगाल और असम में पूजा जाता है। काली का प्राकट्य काल यानी समय से हुआ है जो सबको ग्रास बना लेता है। देवी पार्वती ने इसी रूप में दुष्टों का सर्वनाश किया था और इतने पर भी जब काली का क्रोध शांत नहीं हुआ था स्वयं भगवान शिव उनके पैरों के नीचे सो गए। तब जाकर मां काली का क्रोध शांत हुआ। मां दुर्गा का यह रूप बुराई को खत्म करके अच्छाई को जीत दिलवाने वाला है।

Lakshmi Mata : आरतियां

श्री लक्ष्मी की आरती

आरती का अर्थ है पूरी श्रद्धा के साथ परमात्मा की भक्ति में डूब जाना। भगवान को प्रसन्न करना। इसमें परमात्मा में लीन होकर भक्त अपने देव की सारी बलाए स्वयं पर ले लेता है और भगवान को स्वतन्त्र होने का अहसास कराता है। आरती को नीराजन भी कहा जाता है। नीराजन का अर्थ है विशेष रूप से प्रकाशित करना। यानी कि देव पूजन से प्राप्त होने वाली सकारात्मक शक्ति हमारे मन को प्रकाशित कर दें। व्यक्तित्व को उज्जवल कर दें। बिना मंत्र के किए गए पूजन में भी आरती कर लेने से पूर्णता आ जाती है। आरती पूरे घर को प्रकाशमान कर देती है, जिससे कई नकारात्मक शक्तियां घर से दूर हो जाती हैं। जीवन में सुख-समृद्धि के द्वार खुलते हैं। श्री लक्ष्मी माता की आरती ऊँ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता। तुमको निशदिन सेवत, हर विष्णु विधाता।। ऊँ जय लक्ष्मी माता। ब्रह्माणी रूद्राणी कमला, तुम ही जगमाता। सूर्य चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता।। ऊँ जय लक्ष्मी माता। दुर्गा रूप निरंजनि, सुख सम्पति दाता। जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि पाता।। ऊँ जय लक्ष्मी माता। तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभ दाता। कर्म प्रभाव प्रकाशक, भवनिधि से त्राता।। ऊँ जय लक्ष्मी माता। जिस घर में तुम रहती सब सद्गुण आता। सब सुंदर हो जाता, मन नहीं घबराता।। ऊँ जय लक्ष्मी माता।

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Lakshmi Mata : पूजन की विधि

देवी लक्ष्मी पूजन की सरल विधि

सामग्री देव मूर्ति के स्नान के लिए तांबे का पात्र, तांबे का लोटा, जल का कलश, दूध, देव मूर्ति को अर्पित किए जाने वाले वस्त्र व आभूषण। चावल, कुमकुम, दीपक, तेल, रुई, धूपबत्ती, अष्टगंध। गुलाब के फूल। प्रसाद के लिए फल, दूध, मिठाई, नारियल, पंचामृत, सूखे मेवे, शक्कर, पान, दक्षिणा में से जो भी हो। सकंल्प किसी विशेष मनोकामना के पूरी होने की इच्छा से किए जाने वाले पूजन में संकल्प की जरूरतहोती है। निष्काम भक्ति बिना संकल्प के भी की जा सकती है। पूजन शुरूकरने से पहले सकंल्पलें। संकल्प करने से पहले हाथों मेंजल, फूल व चावल लें। सकंल्प में जिस दिन पूजन कर रहे हैं उस वर्ष, उस वार, तिथि उस जगह और अपने नाम को लेकर अपनी इच्छा बोलें। अब हाथों में लिए गए जल को जमीन पर छोड़ दें। संकल्प का उदाहरण जैसे 21/4/2015 को श्री लक्ष्मी का पूजन किया जाना है। तो इस प्रकार संकल्प लें। मैं ( अपना नाम बोलें) विक्रम संवत् 2072 को वैशाख मास के तृतीया तिथि को मंगलवार के दिन, कृतिका नक्षत्र में, भारत देश के मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन शहर में महाकालेश्वर तीर्थ में इस मनोकामना से (मनोकामना बोलें) श्री लक्ष्मी का पूजन कर रही/ रहा हूं। श्रीलक्ष्मी पूजन की सरल विधि किसी भी कार्य या पूजन को शुरूकरने से पहिले श्री गणेश का पूजन किया जाता हैं। भगवान गणेश को स्नान कराएं। वस्त्र अर्पित करें। गंध, पुष, अक्षत अर्पित करें। अब देवी लक्ष्मी का पूजनशुरूकरें। माता लक्ष्मी की चांदी, पारद या स्फटिक की प्रतिमा का पूजन से भी उत्तम फल की प्राप्ति होती है। जिस मूर्ति में माता लक्ष्मी की पूजा की जानी है। उसे अपने पूजा घर में स्थान दें। मूर्ति में माता लक्ष्मी आवाहन करें। आवाहन यानी कि बुलाना। माता लक्ष्मी को अपने घर बुलाएं। माता लक्ष्मी को अपने अपने घर में सम्मान सहित स्थान देें। यानी कि आसन दें। अब माता लक्ष्मी को स्नान कराएं। स्नान पहले जल से फिर पंचामृत से और वापिस जल से स्नान कराएं। अब माता लक्ष्मी को वस्त्र अर्पित करें। वस्त्रों के बाद आभूषण पहनाएं। अब पुष्पमाला पहनाएं। सुगंधित इत्र अर्पित करें। अब कुमकुम तिलक करें। अब धूप व दीप अर्पित करें। माता लक्ष्मी को गुलाब के फूल विशेष प्रिय है। बिल्वपत्र और बिल्व फल अर्पित करने से भी महालक्ष्मी की प्रसन्नता होती है। 11 या 21 चावल अर्पित करें। श्रद्धानुसार घी या तेल का दीपक लगाएं। आरती करें। आरती के पश्चात् परिक्रमा करें। अब नेवैद्य अर्पित करें। महालक्ष्मी पूजन के दौरन ’’ऊँ महालक्ष्मयै नमः’’ इस मंत्र का जप करते रहें।

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Lakshmi Mata : मंत्र और स्तुतियां

श्री लक्ष्मी चालीसा

श्री लक्ष्मी चालीसा ।। चौपाई ।। सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोही।। तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी।। जय जगत जननि जगदम्बा। सबकी तुम ही हो अवलम्बा।। तुम ही हो सब घट घट वासी । विनती यही हमारी खासी।। जगजननी जय सिन्धु कुमारी । दीनन की तुम हो हितकारी।। विनवौं नित्य तुमहिं महारानी । कृपा करौ जग जननि भवानी।। केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी।। कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी । जगजननी विनती सुन मोरी।। ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता । संकट हरो हमारी माता।। क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो । चौदह रत्न सिन्धु में पायो।। चौदह रत्न में तुम सुखरासी । सेवा कियो प्रभु बनि दासी।। जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा । रुप बदल तहं सेवा कीन्हा।। स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा । लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा।। तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं । सेवा कियो हृदय पुलकाहीं।। अपनाया तोहि अन्तर्यामी । विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी।। तुम समप्रबल शक्ति नहीं आनी। कहं लौ महिमा कहौं बखानी।। मन क्रम वचन करै सेवकाई । मन इच्छित वांछित फल पाई।। तजि छल कपट और चतुराई । पूजहिं विविध भांति मनलाई।। और हाल मैं कहौं बुझाई । जो यह पाठ करै मन लाई।। ताको कोई कष्ट न होई । मन इच्छित पावै फल सोई।। त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी।। जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै । ध्यान लगाकर सुनै सुनावै।। ताकौ कोई न रोग सतावै । पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै।। पुत्रहीन अरु संपति हीना । अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना।। विप्र बोलाय कै पाठ करावै । शंका दिल में कभी न लावै।। पाठ करावै दिन चालीसा । ता पर कृपा करैं गौरीसा।। सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै । कमी नहीं काहू की आवै।। बारह मास करै जो पूजा । तेहि सम धन्य और नहिं दूजा।। प्रतिदिन पाठ करै मन माही। उन सम जग में कहुं नाहीं।। बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई । लेय परीक्षा ध्यान लगाई।। करि विश्वास करै व्रत नेमा । होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा।। जय जय जय लक्ष्मी भवानी । सब में व्यापित हो गुण खानी।। तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं।तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं।। मोहि सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजै।। भूल चूक करि क्षमा हमारी । दर्शन दजै दशा निहारी।। बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी।। नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में।। रुप चतुर्भुज करके धारण । कष्ट मोर अब करहु निवारण।। केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई । ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिकाई।। दोहा - त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास । जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश।। रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर । मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर।।

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Spiritual Quotes

  • किसी मूर्ख व्यक्ति के लिए किताबें उतनी ही उपयोगी हैं जितना कि एक अंधे व्यक्ति के लिए आईना।- चाणक्य

  • जब कभी संभव हो दयालु बने रहिये। यह हमेशा संभव है - दलाई लामा

  • कोई पाप है, तो वो यही है; ये कहना कि तुम निर्बल हो या अन्य निर्बल हैं। - स्वामी विवेकानंद

  • झूठे शब्द सिर्फ खुद में बुरे नहीं होते , बल्कि वो आपकी आत्मा को भी बुराई से संक्रमित कर देते हैं - सुकरात

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