• शरीर के साथ ये संतुलन जीवन को सुखी बनाता है...
    मनुष्य शरीर और आत्मा दोनों से बना है, लेकिन इस सिद्धांत को व्यावहारिक रूप से समझना होगा। जीवन में जो भी क्रिया करें, दोनों को समझकर करें। केवल शरीर पर टिककर करेंगे तो जीवन भौतिकता में ही डूब जाएगा और केवल आत्मा से जोड़कर करेंगे तो अजीब-सी उदासी जीवन में होगी। न बाहर से कटना है और न बाहर से पूरी तरह जुड़ना है। दोनों का संतुलन रखिए। जैन संत तरुणसागरजी दो घटनाएं शरीर से जुड़ी सुनाते हैं। महावीर स्वामी पेड़ के नीचे ध्यानमग्न बैठे थे। पेड़ पर आम लटक रहे थे। बच्चों ने आम तोड़ने के लिए पत्थर फेंके।...
    September 3, 02:35[IST]
  • ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसे ये चीज नहीं मिलती...
    सुख और दुख जीवन के दो पहलू हैं। ये दोनों ही हर व्यक्ति के जीवन में आते-जाते रहते हैं, हमेशा चलते रहते हैं। ऐसा कोई इंसान नहीं है जिसके जीवन में कभी दुख न आया हो या वह कभी सुखी न हुआ हो। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि-कस्य दोष: कुले नास्ति व्याधिना केन पीडि़ता:।व्यसनं केन संप्राप्तं कस्य सौख्यं निरंतरम्।।ऐसा कोई इंसान नहीं है जिसके कुल में कोई दोष या बुराई नहीं है। ऐसा कोई सा प्राणी है जो कभी किसी रोग से ग्रस्त नहीं हुआ है। ऐसा कौन है जो हमेशा ही सुख प्राप्त करता आया है जिसे कभी दुख नहीं मिला।इस संबंध में...
    May 29, 04:41[IST]
  • इस बात से हमें दुखी नहीं होना चाहिए, क्योंकि...
    मनुष्य को जीवन में कई प्रकार के दुख और दर्द प्राप्त होते हैं जिनकी वजह से इंसान दुखी रहता है। दुखों के संबंध में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि-बहुत विधि पक्षी एक तरु, जो बैठे निशि आय।भोर दशों दिशि उडि़ चलें, वह को है ही पछिताय।।अलग-अलग रंग वाले पक्षी एक ही वृक्ष पर रहते हैं, रोज सुबह अलग-अलग दिशाओं में उड़ जाते हैं। फिर शाम को वापस उसी वृक्ष पर आ जाते हैं। ठीक इसी प्रकार का जीवन मनुष्यों का भी होता है। अत: किसी प्रकार का दुख नहीं करना चाहिए।आचार्य चाणक्य कहते हैं कि एक की वृक्ष पर कई प्रकार के पक्षी रहते...
    May 22, 06:20[IST]
  • भगवान भी खुश नहीं होता है ऐसी सफलता से...
    हर आदमी में कुछ भाव स्थायी होते हैं। सफलता पर खुशी, असफलता पर विषाद और कभी-कभी मन में ईष्र्या का भाव। अक्सर हम अपनी सफलता की राह पर खुद अपने मनोभावों के कारण ही रुकावटें खड़ी कर लेते हैं। होना यह चाहिए कि जब हम सफलता की राह पर तेजी से बढ़ रहे हों तो हर्ष, विषाद और ईष्र्या तीनों ही तरह के भावों को छोड़कर आगे बढ़ें। तभी जीवन का सच्चा आनंद और सफलता का सुख भोग सकेंगे। जब हम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे होते हैं तो हमारा प्रयास रहता है कि हमारी ऊर्जा पूरी तरह एकाग्र होकर सफलता अर्जित करने में लगी रहे, लेकिन...
    May 17, 12:45[IST]
  • ऐसे लोग दूसरों के दुख को देखकर खुश होते हैं...
    सभी लोगों के लिए कुछ न कुछ खास बात या चीज होती है जिससे उन्हें खुशी प्राप्त होती है। इस संबंध में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि-तुष्ट होत भोजन किये, ब्राह्मण लखि घन मोर।पर संपत्ति लखि साधु जन, खल लखि दुख घोर।।किसी भी ब्राह्मण को यदि स्वादिष्ट भोजन मिल जाए तो वह खुश हो जाता है। मोर बादलों की गरज से खुश होते हैं। सज्जन लोग दूसरों के सुख को देखकर सुखी होते हैं। जबकि बुरे स्वभाव वाले लोग दूसरों के दुख को देखकर प्रसन्न होते हैं।आचार्य चाणक्य कहते हैं कि किसी भी ब्राह्मण को यदि स्वादिष्ट पकवान मिल जाए तो...
    February 25, 09:26[IST]
  • ऐसे स्त्री और पुरुष हमेशा दुख ही देते हैं...
    आचार्य चाणक्य ने तीन प्रकार के ऐसे लोग बताए हैं जिनसे किसी भी प्रकार का व्यवहार करने पर दुख ही प्राप्त है। अत: इन लोगों से हमेशा दूर रहना ही बुद्धिमानी है।चाणक्य कहते हैं-मूर्खाशिष्योपदेशेन दुष्टास्त्रीभरणेन च।दु:खिते सम्प्रयोगेण पंडितोऽप्यवसीदति।।इस श्लोक का अर्थ है कि मूर्ख शिष्य को उपदेश देने पर, किसी व्यभिचारिणी स्त्री का भरण-पोषण करने पर और दुखी व्यक्तियों के साथ किसी भी प्रकार का व्यवहार करने पर दुख ही प्राप्त होता है।आचार्य कहते हैं कि किसी भी मूर्ख शिष्य या विद्यार्थी को...
    February 16, 07:38[IST]
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