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ऐसे झलकता है नारी का सौंदर्य खजुराहो में

Dharm desk, Ujjain | Apr 22, 2010, 19:38PM IST
खजुराहो को कला तीर्थ कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। मूर्तिकला, स्थापत्य कला, शिल्प कला हर पैमाने पर अद्वितीय और अनुपम है खजुराहो के मंदिर। यहां की प्रतिमाओं और मूर्तियों में मानवीय जीवन, प्रकृति और अध्यात्म से जुड़े हर विषय समाए हैं। अनेक पौराणिक प्रसंगों और सामाजिक जीवन से जुड़ी क्रियाओं को भी इन प्रतिमाओं में दर्शाया गया है। जैसे सागर मंथन, पूतना राक्षसी का वध आदि। इसी प्रकार पत्र लिखना, कुश्ती, पशुपालन, नृत्य आदि भी शामिल है। इन सभी विषयों में से खजुराहों के मंदिरों और भित्ति चित्रों में सबसे प्रमुख विषय उभरकर सामने दिखाई देता है तो वह है नारी और उसका सौंदर्यं पक्ष। खजुराहो मंदिरों में उकेरी गई मूर्तियों में स्त्री अलग-अलग रुप में दिखाई देती है। इन रुपों में अप्सरा, नर्तकी, देवी, गृहिणी आदि प्रमुख है। इन प्रतिमाओं में स्त्री के जीवन का लगभग हर पक्ष समाया है। स्त्री के दैनिक जीवन, व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक जीवन से संबंधित विभिन्न गतिविधियों, क्रियाओं यहां तक कि स्त्री के हाव-भाव को शिल्पकला के माध्यम से पाषाण प्रतिमाओं में उकेरा गया है। खजुराहो के मंदिरों में उत्कीर्ण प्रतिमाएं स्त्री स्वभाव, चरित्र को पूर्ण और सुंदरतम रुप में प्रस्तुत करती है। वह स्त्री को मन और कर्म दोनों से सुंदर दर्शाती है। खजुराहो में नारी जीवन के भिन्न रुपों में जैसे अध्ययन करते हुए, नृत्यांगना, चित्रकार, क्रीड़ा करते हुए, खिलाड़ी आदि दर्शाया गया है। कई मूर्तियों में स्त्री फूलों और आभूषणों से सजी हुई है। स्त्री द्वारा पहने जाने वाले हर आभुषण को प्रतिमाओं में उकेरा गया है। नारी की दैनिक जीवन से जुड़ी अनेक गतिविधियों को जैसे बाल सुखाते हुए, भगवान की उपासना करते हुए, शिशु को प्यार करते हुए, स्तनपान कराते हुए, पानी भरते हुए, पैर से कांटे निकालते हुए तथा यहां तक कि बिच्छू के शरीर पर चढ़ जाने पर भयभीत होकर तन से वस्त्र गिराने को भी बहुत ही शिल्प कौशल के साथ प्रतिमाओं में उकेरा गया है। यह मूर्तियां दर्शकों को बहुत मोहित करती है। साथ ही नारी के सोलह श्रृंगार से संबंधित सभी वस्तुओं और हाव-भाव को भी प्रतिमाओं में उकेरा है। प्रतिमाओं में श्रृंगार के बाद दर्पण देखते हुए, बालों को संवारते हुए, आंखो में मस्कारा या काजल लगाते हुए, होंठो को लाल करते हुए, पैरों में मेंहदी लगाते हुए भी कई प्रतिमाएं बनाई गई हैं। इसके अलावा खुजराहों में निर्मित पाषाण मूर्तियों को देखकर ऐसा लगता है कि उस काल में स्त्री सौंदर्य प्रदर्शन में संकोच नहीं करती थी। क्योंकि प्रतिमाएं अधिक वस्त्र धारण किए नहीं है। अनेक प्रतिमाओं में कमर के नीचे धोती है, किंतु सिर पर कोई वस्त्र नहीं ढंका है। प्रतिमाओं में वक्ष पर कंचुकी है पर वक्ष स्थल ढंकने के लिए कोई दुपट्टा या वस्त्र नहीं दिखाई देता है। प्रतिमाओं में स्त्री के हर अंग के पूर्ण सौंदर्य, लावण्यता और मांसलता दर्शाने के लिए शिल्पकला की कौशलता स्पष्ट झलकती है। स्त्री-पुरुष के प्रेम संबंधों को स्वाभाविक और मोहकता के साथ दर्शाया गया है। ऐसी प्रतिमाओं में स्त्री और पुरुष को समान भाव से आनंदित दिखाया गया है। इनमें न पुरुष के हावभाव में लंपटता दिखाई देती है, न ही स्त्री भोगी या विलासी दिखाई देती है। स्त्री के हाव-भाव को उभारने के लिए आंखों और हाथ-पैरों की मुद्राओं को बड़ी सुंदरता से उत्कीर्ण किया गया है। नारी के उठने-बैठने, चलने-फिरने आदि सभी हरकतें इन प्रतिमाओं में देखी जा सकती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि खजुराहों के मंदिरों में स्त्री के विभिन्न रुपों पर आधारित प्रतिमाएं नारी के मासूम, मोहक, शक्तिरुपा और सुंदर पक्ष को दर्शाती है। खजुराहों में स्थित प्रतिमाओं और मंदिरों को मानव जीवन की आयु और चार पुरुषार्थ को सामने रखकर विचार करें तो यह दर्शन मिलता है कि जब व्यक्ति गृहस्थ जीवन में पहुंचकर अर्थ और क ाम के साथ धर्म, अध्यात्म और ईश भक्ति को जीवन में अपनाता है, तब धर्म, अर्थ और काम का ऐसा संगम व्यक्ति के मन और आत्मा को अंतत: इतना सबल और शक्तिशाली बनाता है कि वह पुरुषार्थ के अंतिम चरण मोक्ष को प्राप्त करने के लिए मोह, आसक्ति छोड़कर सब कुछ त्याग करने को तैयार हो जाता है।
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