
तिरुअनंतपुरम के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में खजाने के संबंध में एक खास बात सामने आई है कि वहां पांच तहखाने तो खोले जा चुके हैं लेकिन अन्य तहखाना खोलना बाकी है। इस तहखाने के दरवाजे पर नाग का चिन्ह होना कई प्रकार के रहस्य पैदा कर रहा है।
इस दरवाजे को खोलने के कई प्रयास किए गए लेकिन इसका ताला नहीं खुल सका। इस स्थिति में कई अटकलें लगाई जा रही है कि इस तहखाने के खजाने की रक्षा स्वयं नागदेवता कर रहे हैं। इसी वजह से इसका दरवाजा खुल नहीं पा रहा है।
पद्मनाभ मंदिर के इस तहखाने के संबंध में उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार नागों के बारह प्रकार होते है। इनमें से कौन सा नाग धन के आसपास है। इसकी जानकारी होना बहुत ही आवश्यक है। पद्मनाभ मंदिर में दरवाजे पर बने नागों का चित्र में कौन से नाग है?
यह जानने पर उस दरवाजे को खोलना आसान हो सकता है। अन्यथा उसके कुछ दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं। पं. शर्मा के अनुसार सर्पों की उत्पत्ति कश्यप एवं उनकी पत्नि कदु्र से हुई थी। उनकी एक माता अदिति है। जिनसे देवताओं का जन्म हुआ इसलिए नागों को देवता भी माना जाता है। सर्प विभिन्न जातियों एवं प्रजातियों के होते हैं। इनमें नाग सबसे सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
ऐसा माना जाता है जिस व्यक्ति की धन में आसक्ति होती है। वह मरने के बाद सांप का रूप लेकर उस धन की रक्षा करता है। नागों का रहने का स्थान पाताल होता है। जो धन जमीन में गढ़ा होता है। वह पाताल से नागों को अपनी और आकर्षित कर लेता है। उस जगह पर नाग अपना डेरा जमा लेता है।
नागों के बारह प्रकार होते है। इनमें से कौन सा नाग धन के आसपास है। इसकी जानकारी होना बहुत ही आवश्यक है। पद्मनाभ मंदिर के छठे तहखाने के दरवाजे पर बने नागों के चित्र ने कई प्रकार के प्रश्र उठा दिए हैं। इस संबंध में यह जानना अति आवश्यक है कि उस दरवाजे पर किस नाग का चित्र है। तभी वह दरवाजा खोलना आसान हो सकता है। अन्यथा उसके कुछ दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं।
इस तरह खुल सकता है तहखाना
बंद तहखाने को खोलने के लिए शास्त्रों में विधि बताई गई है। सबसे पहले सर्प की पहचान की जाए, जो खजाने की रक्षा कर रहा है। इसके बाद वैदिक और शास्त्रोक्त पद्धतियों से नाग की उस जाति की पूजा कर उसे प्रसन्न किया जाए। इसके बाद तहखाना खोला गया तो किसी प्रकार के अपशकुन से बचा जा सकता है।
कितने प्रकार के होते हैं नाग
शास्त्रों के अनुसार अनंत, कुलिक, वासुकी, शंखपाल, पद्म, महापद्म, तक्षक, कर्कोटक, शंखचूड, घातक, विषधर और शेषनाग। यह नागों के बारह प्रकार है। नाग के वर्ण के अनुसार भी विभाजित होते है। मंदिर पर बने नागों के चित्र कुछ न कुछ सकेंत अवश्य करते हैं।
नाग ही क्यों करते हैं खजानों की रक्षा
पूर्व काल में राजा महाराज आक्रमणकारियों के भय से राजकोष को सुरक्षित जगहों पर छिपा या गाढ़ देते थे। इन स्थानों को कील दिया जाता था। कील करने का अर्थ है लॉक कर देना तथा उस पर नागों को अभिमंत्रित कर पहरे पर लगा दिया जाता था। ऐसा इसलिए किया जाता था क्योंकि नागों की आयु हजारों साल मानी जाती है। अगर कोई दुर्घटना नहीं हो तो नाग हजारों साल जीवित रह सकता है। विषहीन एवं अल्पविष वाले सर्प भी 75 से 100 वर्ष की आयु तक जीवित रह सकते हैं।
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