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जानें, क्या है शीतला माता पूजा से जुड़ा ठंडे भोजन का विज्ञान?

धर्म डेस्क. उज्जैन | Mar 13, 2012, 17:06PM IST
जानें, क्या है शीतला माता पूजा से जुड़ा ठंडे भोजन का विज्ञान?

जीवन और मौसम के बदलाव में संयम, धैर्य और अनुशासन से जीवन बिताने पर ही सुख और शांति संभव है, नहीं तो मृत्यु के समान दु:ख भोगना पड़ सकते हैं। ऐसी ही सीख देने के लिए प्राचीन ऋषि-मुनियों ने मौसम में होने वाले बदलावों के कारण होने वाले घातक रोगों को अपने ज्ञान और अनुभव से पहचान धार्मिक परंपराओं में रोगों के उपचार और शमन के अचूक उपाय जोड़े।

ये उपाय मनुष्य को धर्म से जोड़कर तन के साथ ही मन को भी संयमित और अनुशासित रहना सिखाते है। ऐसे ही रोगों में चेचक नामक रोग का प्रकोप खासतौर पर गर्मी के मौसम में दुनिया के अनेक स्थानों पर आज भी देखा जाता है। इसे भारतीय समाज में माता या शीतला के नाम से भी जाना जाता है।

हिन्दू धार्मिक परंपराओं में चैत्र माह कृष्ण पक्ष अष्टमी शीतलाष्टमी (15 मार्च) का व्रत रखा जाता है। इसमें भगवती स्वरूप शीतलादेवी को बासी या शीतल भोजन का भोग लगाया जाता है। इसलिए यह व्रत बसोरा नाम से भी जाना जाता है।

धार्मिक दृष्टि से यह व्रत और ठंडा भोजन शीतला माता की प्रसन्नता के लिये किया जाता है। किंतु वैज्ञानिक नजरिए से इस परंपरा के पीछे चेचक रोग से बचाव व इसकी पीडा का शमन करना ही है। धर्मशास्त्रों में भी इस रोग का संबंध माता के गर्भ से ही बताया गया है। जिसके अनुसार जब बालक गर्भ में होता है तब उसकी नाभि माता के हृदय से एक रक्त नली द्वारा जुडी होती है। उसी से उसका पोषण भी होता है। यही संधि स्थान ही इस रोग का मुख्य केन्द्र माना जाता है। गर्भ से बाहर आने पर कालान्तर में अनियमित खान-पान और मौसम के बदलाव से व्यक्ति के माता से प्राप्त इसी रक्त में दोष पैदा होने से चेचक नामक रोग उत्पन्न होता है। विशेष रुप से गर्मी के मौसम में यह भीषण प्रकोप होता है।

इस व्रत और रोग के संबंध में धार्मिक दर्शन यह है कि पुराणों में माता के सात मुख्य रूप बताए गए हैं। ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी और चामुण्डा।  धर्मावलंबी इनमें से भाव के अनुसार किसी माता को सौम्य एवं किसी को उग्र भाव मानते हैं।  इस रोग से कौमारी, वाराही और चामुण्डा को प्रभाव भयानक माना जाता है। जिसके संयम और लापरवाही की स्थिति में रोगी के नेत्र, जीभ के साथ ही शरीर से हमेशा के लिए असहाय हो जाता है।

पुराणों में माता शीतला के रूप का जो वर्णन है, उसके मुताबिक उनका वाहन गधा बताया गया। उनके हाथ में कलश, झाडू होते हैं। वह नग्र स्वरुपा, नीम के पत्ते पहने हुए और सिर पर सूप सजाए हुए होती है। चेचक रोग की दृष्टि से इस स्वरुप की प्रतीकात्मकता यह है कि चेचक का रोगी बैचेन होकर निर्वस्त्र हो जाता है। संक्रमण से बचाने के लिए उसे सूप हिलाकर हवा से ठंडक करते हैं और झाडू से चेचक के फोडे फट जाते हैं। नीम के पत्ते औषधीय गुणों के कारण फोडों को सडऩे नहीं देते। कलश का यह महत्व है कि बुखार में तपते रोगी को ठंडा जल अच्छा लगता है। गधे का स्वभाव भी सहनशील और धैर्यवान माना जाता है। जो यह सीख देता है कि चेचक का रोगी भी इस रोग की पीड़ा में सहनशील रहकर उचित समय तक संयम रखने पर इस रोग से मुक्ति पा सकता है। ऐसा माना जाता है कि गधे की लीद से चेचक के दाग हल्के हो जाते हैं।


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