
अगर आपका घर पूर्व मुखी है तो इन बातों का खास ध्यान रखें

भवन या अन्य कोई निर्माण करते समय जितने संभव हो उतने वास्तु सिद्धांतों का पालन अवश्य करना चाहिए। किसी भी भूखण्ड पर निर्माण करते समय उसके शुभ-अशुभ फलों पर विचार करना जरुरी होता है। भवन, कारखाना या फिर दुकान आदि के फलीभूत होने में मुख्य द्वार की भूमिका विशेष होती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार आठ दिशाओं में भवन के मुख्य द्वार हो सकते हैं। सबसे पहले हम जानते हैं पूर्व मुखी भवन का निर्माण करवाते समय किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए तथा उनके क्या शुभ-अशुभ फल होते हैं-
1- भवन के पूर्व-उत्तर में रिक्त स्थान अवश्य छोड़े जिससे धन, वंश और पुत्र लाभ के साथ-साथ स्वास्थ्य भी बेहतर रहेगा।
2- जहां तक हो सके भवन का पूर्व भाग नीचा रखें, जिससे भवन स्वामी स्वस्थ व साधन सम्पन्न होगा।
3- यदि भवन में किराएदार रखना हो तो स्वयं उन्नत भाग में रहें और किराएदार को अवनत भाग में रखें। अवनत भाग को रिक्त न रखें उसे प्रयोग में अवश्य लाएं।
4- भवन में आग्नेय(पूर्व-दक्षिण) कोण में कोई अन्य द्वार न रखें। यदि ऐसा करेंगे तो मुकद्में, आर्थिक तंगी, चोरी व अग्नि का भय बना रहेगा।
5- भवन में पूर्व दिशा या पूर्व उत्तर(ईशान) कोण में कुआं या हैंडपंप या ट्यूबवैल या जलस्त्रोत का स्थान अवश्य बनाएं।
6- पूर्व दिशा में बरामदा अवनत रखने पर घर में स्वास्थ्य और यश की वृद्धि होती है।
7- पूर्व दिशा की चार दीवारी, पश्चिम दिशा की चार दीवारी से कम ऊंचाई में होनी चाहिए।
8- भूखण्ड के पूर्व भाग या ईशान कोण को अपवित्र न रखें, ऐसा करने से धन और संतान की हानि होती है।










