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जब कोई बात गलत लगे तो क्या करना चाहिए?

डॉ.विजय अग्रवाल | Jan 03, 2013, 16:06PM IST
जब कोई बात गलत लगे तो क्या करना चाहिए?
 
वैसे विकास की सबसे बड़ी संभावना परिवर्तन के काल में ही होती है और हमारी नासमझी और कमजोरी यह है कि हम विकास तो चाहते हैं तो लेकिन बिना परिवर्तन के इसमें कोई दो राय नहीं कि परिवर्तन का काल कोई बड़ा सुखद काल नहीं होता। एक बार ट्रेन में बैठ जाने पर उतनी दिक्कत नहीं होती, जितनी कि यात्रा की तैयारी करने में होती है- रिजर्वेशन कराने से लेकर बोगी में सामान जमा देने तक। इसलिए लोग परिवर्तन को आसानी से पचा नहीं पाते हैं, लेकिन जो लोग पचा लेते हैं परचम उन्हीं के हाथ में आ जाता है। राम ने इसे रिकगनाइज कर लिया था।
पहचान लिया था। राम के साथ एक अन्य बड़ी दिक्कत थी। वे किसी भी तथ्य को उसके परंपरागत रूप में स्वीकार नहीं कर पाते थे। जाहिर है कि जो व्यक्ति परिवर्तन की शक्ति को पहचानेगा, वह स्वयं परिवर्तन का आधार भी बनेगा। जहां ठीक लगा वहां राम ने रघुकुल की रीति को माना जहां नहीं लगा वहां उन्होंने प्रश्र खड़े कर दिए। यह बात अलग है कि उन्होंने अपने द्वारा उठाए गए इन प्रश्रों का हल विद्रोह में न ढूंढ कर उसके लिए कोई न कोई शालीन और शांति का रास्ता  ढूंढ निकाला, लेकिन जिसे बदलना था उसे बदला जरूर। यह विद्रोह करने का उनका अपना तरीका था। वनवास प्रसंग के प्रारंभ में ही हमें इस बदलाव का स्पष्ट संकेत उस समय मिल जाता है। जब मुनि वशिष्ठ श्रीराम के पास उन्हें राज्याभिषेक के लिए स्वयं को तैयार करने के लिए कुछ आवश्यक निर्देश देते हैं। मुनि वसिष्ठ कहते हैं कि हे राम, राजा ने राज्याभिषेक की तैयारी की है। वे आपको युवराज पद देना चाहते हैं। इसलिए आज आप सभी तरह से संयम कीजिए ताकि ईश्वर इस कार्य को सफलतापूर्वक सम्पन्न कर दें। मुनि के ये शब्द सुनकर राम के हृदय में विस्मय हुआ यानी कि आश्चर्य हुआ दुख हुआ। सच पुछिए तो आश्चर्य होना ही नहीं चाहिए थी क्योंकि अब तक तो यही रीति चली आ रही थी कि राजा का सबसे बड़ा पुत्र ही राजगद्दी को प्राप्त करेगा। 
राम का मन विस्मित हुआ कि जब हमारे सारे काम साथ-साथ हुए तो सब भाइयों को छोड़कर मेरा ही राज्यभिषेक क्यों? अगर आपको कोई बात गलत लगती है और आप उसके लिए कुछ नहीं कर रहे हैं तो सच यही है कि आपको वह बात गलत लग ही नहीं रही है। यदि आप थोड़ी सुक्ष्मता से सोचे तो पाएंगे कि कैकयी के ये वरदान मुलत: एक ही है और वह है भरत को राजगद्दी। राम स्वयं के लिए राजसिंहासन चाहते ही नहीं थे। राम तो खुद भी परिवर्तन के आकांक्षी थे। हो सकता था कि कैकयी को अगर इस बात का अंदाजा मिल जाता तो रामजी से वे अपनी इच्छा की पूर्ति करवा लेतीं। मामला दशरथ तक पहुंचता ही नहीं लेकिन चूंकी होना यही था, इसलिए यही हुआ।
 
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