आचार्य चाणक्य के अनुसार-
विद्यार्थी सेवक: पान्थ: क्षुधार्तो भयकातर:।
भाण्डारी प्रतिहारी च सप्त सुप्तान् प्रबोधयेत्।।
इस श्लोक में आचार्य चाणक्य ने बताया है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन शिक्षा का बहुत अधिक महत्व है। इसी वजह से शिक्षा ग्रहण करते समय अधिक से अधिक समय अभ्यास ही करना चाहिए। अत: यदि कोई विद्यार्थी परीक्षा के समय सो रहा है तो उसे तुरंत उठा देना चाहिए ताकि वह विद्या का अभ्यास ठीक से कर सके। अन्यथा विद्यार्थी सोता रहेगा तो वह परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सकता है।