आचार्य चाणक्य कहते हैं कि-
अर्थनाशं मनस्तापं गृहिणीचरितानि च।
नीचवाक्यं चाऽपमानं मतिमान्न प्रकाशयेत्।।
इस श्लोक में आचार्य ने बताया है कि किसी भी परिस्थिति में अपने धन का नाश किसी अन्य व्यक्ति के सामने उजागर नहीं करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति व्यापारी है और उसके जीवन में कोई बड़ी धन की हानि हुई है तो ये बात किसी को बताना नहीं चाहिए। यदि धन की हानि अन्य लोगों के सामने आ जाएगी तो कोई भी धन संबंधी कार्यों में आप पर विश्वास नहीं करेगा।