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पेट की इस बड़ी बीमारी का आदिवासियों के पास रामबाण इलाज, ये हैँ खास नुस्खे

धर्मडेस्क. उज्जैन | Aug 08, 2013, 16:02PM IST


पेट से संबंधित ये समस्याएं लगातार होते रहने से पेप्टिक अल्सर होने की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता है। अब अल्सर के इलाज में ज्यादातर एंटीबायोटिक्स का प्रयोग किया जा रहा है। लगभग 2से 3 प्रकार के एंटीबायोटिक्स का एक के बाद एक प्रयोग करने से संक्रमण नियंत्रण में रहता है, अल्सर ठीक होते हैं तथा अतिरिक्त अल्सर बनने पर भी रोक लगती है लेकिन ये एंटीबायोटिक्स किस कदर आपके शरीर के लिए घातक हो सकते है, इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है, आखिर क्या बला है पेप्टिक अल्सर?  देसी भाषा में "पेट के छाले" कहे जाने वाले इस रोग के लिए आदिवासियों के कुछ चुनिंदा फ़ार्मुले भी हैं जिन्हें वे सदियों से आजमाए और अपनाए हुए हैं। आइए समझने की कोशिश करते हैं और जानते हैं कि क्या इसका इलाज हर्बल मेडिसिन्स के जरिए  संभव है?

पेप्टिक अल्सर के संदर्भ में रोचक जानकारियों और परंपरागत हर्बल ज्ञान का जिक्र कर रहें हैं डॉ दीपक आचार्य (डायरेक्टर-अभुमका हर्बल प्रा. लि. अहमदाबाद)। डॉ. आचार्य पिछले 15 सालों से अधिक समय से भारत के सुदूर आदिवासी अंचलों जैसे पातालकोट (मध्यप्रदेश), डाँग (गुजरात) और अरावली (राजस्थान) से आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान को एकत्रित कर उन्हें आधुनिक विज्ञान की मदद से प्रमाणित करने का कार्य कर रहें हैं।

 मध्यप्रदेश के पातालकोट घाटी के आदिवासी हर्बल जानकार जिन्हें भुमका कहा जाता है, अक्सर पेप्टिक अल्सर के रोगियों को कच्ची पत्तागोभी खाने की सलाह देते है। वे पत्ता गोभी के रस की एक लीटर मात्रा, दिन में एक बार, प्रतिदिन लगातार सात दिनों तक लेने की सलाह भी देते हैं और साथ ही चाय और कॉफी पीने पर परहेज की बात की जाती है।

 बबूल गोंद को भी पेप्टिक अल्सर ठीक करने के लिए अचूक माना जाता है। बबूल गोंद का चूरा (20ग्राम) लगभग 100 मिली दूध में डालकर 5 मिनट तक कम आँच पर गर्म किया जाए और फ़िर 15 ग्राम तुलसी पत्तियों को इसमें डालकर बर्तन को ढाँक दिया जाए। जब यह दूध ठंडा हो जाए तो इसे रोगी को देने से शीघ्र आराम मिलने लगता है।

आदिवासी हर्बल जानकार रत्ती या चनौठी की पत्तियों का उपयोग कर पेट के छालों का इलाज करते हैं। रत्ती की पत्तियों को सुखाकर गाय के 250 मिली दूध में डाल दिया जाता है और इसमें चुटकी भर हल्दी डालकर अच्छी तरह से फ़ेंट दिया जाता है और बर्तन को अगले 2 घंटों के लिए ढाँककर रख दिया जाता है और फ़िर पेप्टिक अल्सर के रोगी को दिया जाता है। जानकार मानते हैं कि यह फ़ार्मुला पेट में ठंडक दिलाता है और छालों को भरने का काम करता है।

गुजरात के डाँग जिले के हर्बल जानकार बीजासार या विजयसार की 30 ग्राम छाल बारीक पीसकर आधे लीटर पानी में डालकर सारी रात के लिए रख देते है और अगले दिन सुबह इसे छानकर रोगी को खाली पेट पीने कहा जाता है।

 पातालकोट में आदिवासी विजयसार की छाल छाँव में सुखाते है और जब छाल पूरी तरह से सूख जाए तो इसे मटके में डाल आधा मटका पानी भर देते है और इसमें कम से कम 25 आँवले (चीरा लगाए हुए) डाल दिए जाते है और मटके को अंधेरे में रखा जाता है। पूरे 5 दिनों बाद छाल और आँवले को बाहर निकाल लिया जाता है पानी छान लिया जाता है। इस पानी को पेप्टिक अल्सर के रोगी को प्रतिदिन 4 से 5 बार एक-एक गिलास पीने की सलाह दी जाती है, जानकारों की मानी जाए तो यह फ़ार्मुला बडी रफ़्तार से रोगी को रोगमुक्त करता है।

 डाँगी हर्बल जानकारों के अनुसार कच्चा आलू भी पेप्टिक अल्सर के लिए बडा कारगर होता है, कच्चे आलू को बारीक-बारीक टुकडे कर मिक्सर में पानी के साथ इसका रस बना लिया जाए या कुचलकर भी रस तैयार किया जा सकता है और फ़िर इस रस का सेवन प्रतिदिन सुबह एक सप्ताह तक किया खाली पेट किया जाए, आराम मिलने लगता है।

 

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