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PICS: 6 को कालभैरवाष्टमी पर कब व कैसे करें भैरव पूजा

धर्म डेस्क. उज्जैन | Dec 05, 2012, 19:31PM IST
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शिव का एक नाम 'भगवान' भी है। शास्त्रों में भगवान का मतलब सर्वशक्तिमान व ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान व वैराग्य सहित छ: गुणों से संपन्नता भी बताया गया है। शिव व उनके सभी अवतारों में ये गुण उजागर होते हैं व उनकी भक्ति भी सांसारिक जीवन में ऐसी शक्तियों की कामना पूरी करती है। 
हिन्दू मान्यताओं के मुताबिक मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी (6 दिसंबर) को शिव ने भैरव अवतार लिया, जिसका लक्ष्य दुर्गुणी व दुष्ट शक्तियों का अंत ही था, जो सुख, ऐश्वर्य व जीवन में बाधक होती है। शिव का यह कालरक्षक भीषण स्वरूप कालभैरव व काशी के कोतवाल के रूप में पूजनीय है। 
यही वजह है कि इस दिन कालभैरव के साथ शिव के कई भैरव स्वरूपों की पूजा काल, धन, यश की कामना को पूरी करने वाली मानी गई है। किंतु कामनासिद्धि या धन लाभ की नजरिए से शास्त्रों में भैरव पूजा के सही वक्त व तरीके बताए गए हैं। जानिए ये उपाय - 
- पौराणिक मान्यताओं में भैरव अवतार प्रदोष काल यानी दिन-रात के मिलन की घड़ी में हुआ। इसलिए भैरव पूजा शाम व रात के वक्त करें। 
- रुद्राक्ष शिव स्वरूप है। इसलिए भैरव पूजा रुद्राक्ष की माला पहन या रुद्राक्ष माला से ही भैरव मंत्रों का जप करें। 
- स्नान के बाद भैरव पूजा करें, जिसमें भैरव को 'भैरवाय नम:' बोलते हुए चंदन, अक्षत, फूल, सुपारी, दक्षिणा, नैवेद्य लगाकर धूप व दीप आरती करें। 
- भैरव आरती तेल के दीप से करें। 
- भैरव पूजा में भुने चने चढ़ाने का महत्व है। तंत्र शास्त्रों में मदिरा का महत्व है, किंतु इसके स्थान पर दही-गुड़ भी चढ़ाया जा सकता है। 
- भैरव की आरती तेल के दीप व कर्पूर से करें। 
- भैरव पूजा व आरती के बाद विशेष रूप से शिव का ध्यान करते हुए दोष व विकारों के लिए क्षमा प्रार्थना कर प्रसाद सुख व ऐश्वर्य की कामना से ग्रहण करें।
 
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