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shiv shlok

धर्म डेस्क, उज्जैन | Jan 06, 2013, 01:00AM IST
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यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवपगा मस्तके
भाले बालविधुर्गे च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।
सोयं भूमिविभूषण: सुरवर: सर्वाधिप: सर्वदा।
शर्व: सर्वगत: शिव: शशिनिभ: श्रीशङ्कर पातु माम्।।
सरल शब्दों में अर्थ है कि जिनकी गोद मे हिमालय की पुत्री पार्वती, मस्तक पर गंगाजी, ललाट पर दितीया यानी दूज का चांद, कण्ठ में भयंकर विष, वक्षस्थल पर नागराज शेष सुशोभित हैं। भस्म से रमे, देवताओं में भी श्रेष्ठ, भक्तों के पापों के संहारक, सर्वव्यापी यानी हर जगह मौजूद, कल्याणकारी, चन्द्रमा की तरह उजली आभा वाले भगवान शंकर मेरी रक्षा करे। 

  
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