
प्रेम है या आकर्षण! इस छोटी सी बात से हो जाती परख
धर्म डेस्क, उज्जैन | Feb 10, 2013, 09:45AM IST

धर्मशास्त्रों की बातें साफ करती हैं कि प्रेम ही हर रिश्ते की बुनियाद है। सरल शब्दों में कहें तो बोल और व्यवहार में अगर प्रेम का भाव नहीं उतरता तो सुखों की आशा करना बेकार है। यही वजह है कि शास्त्रों में प्रेम को धर्म पालन का अहम अंग भी बताया गया है। किंतु आज के भाग-दौड़ भरे दौर में कई बार रिश्तों में सच्चे प्रेम के जगह पर स्वार्थ या दिखावे के वशीभूत प्रेम अधिक नजर देता है। आखिर एक साधारण इंसान सच्चे प्रेम, आकर्षण या बनावटी प्रेम का फर्क कैसे पहचानें? शास्त्रों में लिखी कुछ बातों से इस सवाल का जवाब बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
हिन्दू धर्मशास्त्र नारद भक्ति सूत्र में लिखा है - "अनिर्वचनीयं प्रेम स्वरूपम्।"
इसका व्यावहारिक मतलब है कि सच्चा प्रेम महसूस किया जा सकता है, लेकिन शब्दों से उजागर नहीं किया जा सकता। प्रेम का भाव अटूट, अदृश्य, अनुभव योग्य, इच्छाओं और अपेक्षाओं से परे होता है।
इस तरह कहा जा सकता है कि स्वार्थ, गुणों या इच्छा के वशीभूत होकर पैदा हुए भाव प्रेम नहीं होते, बल्कि आकर्षण होता है। इसके उलट नि:स्वार्थ प्रेम कभी कम नहीं होता, वह अमर और अंतहीन होता है। ऐसा प्रेम ही सांसारिक जीवन में मन-मस्तिष्क में एक-दूसरे के लिए जगह बनाता है और व्यवहारिक तौर पर करीब भी रखता है।
वहीं भक्ति व अध्यात्म के नजरिए से भक्ति में ऐसे प्रेम से भक्त का मन भगवान के ही चिंतन और मनन में डूब जाता और उसे भगवान के अलावा दूसरों में भी कोई नजर नहीं आता।










