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PICS: बार-बार हो रहे हैं नाकाम! परखें, कहीं इस आदत के शिकार तो नहीं

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कई लोग स्वभाव के चलते, अपनी कमियों पर पर्दे डालने के लिए या फिर फायदे के लिए दूसरों की बुराई या कमियां ढूंढने की कवायद में लगे रहते हैं। यानी किसी भी तरह से पैदा द्वेषता या स्वार्थ पूरे न होना भी निंदा यानी बुराई की वजह होती ती है। 
शास्त्रों में इसे परदोष दर्शन पुकारा गया है। ऐसी आदत व्यावहारिक जीवन के लिये बाधक मानी गई है। क्योंकि निंदा, बुराई या दोष दर्शन लत बनकर सोच, व्यवहार और काम को बिगाड़ते हैं। धर्म के नजरिए से इससे किसी भी व्यक्ति या काम के लिए समर्पण का अभाव हो जाता है। 
श्रीमद्भभागवत में भी दूसरों की बुराई न करने पर जोर दिया गया है। इन बातों का निचोड़ यही है कि दूसरों की निंदा जीवन पर बुरा असर ही नहीं डालती बल्कि दुर्गति की बड़ी वजह बन सकती है। किस तरह इसका शिकार होकर इंसान जीवन के हर मोर्चे पर मात खाता है, अगली तस्वीर पर क्लिक कर जानिए- 

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