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PICS: 21 दिसंबर को महाविनाश के दावे का सच इन खास बातों से भी परखें!

धर्म डेस्क. उज्जैन | Dec 12, 2012, 19:53PM IST
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गणित व खगोल विज्ञान की अद्भुत जानकार दुनिया की पुरानी सभ्यताओं में एक अमेरिका की माया सभ्यता की मान्यताओं व कालगणना के मुताबिक साल 2012 के माह दिसंबर में दुनिया की तबाही की आखिरी घड़ी है। इस वक्त के नजदीक आने के साथ दुनिया खत्म होने के दिन और तबाही की वजहों को लेकर कई दावे और अनुमान सामने आते रहे हैं। इनमें किसी ग्रह के पृथ्वी के टकराने, कभी सूर्य की ऊर्जा व किरणों से पैदा सौर तूफान, जल प्रलय के दावे भी प्रमुख हैं। पिछले कुछ सालों में देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भारी बारीश, भूकंप व तूफान जैसी कुदरती घटनाओं से हुई तबाही ऐसी बातों को और बल देती रहा है कि क्या वाकई इस साल माया सभ्यता के कैलेण्डर के मुताबिक 21 दिसंबर 2012 को दुनिया का विनाश हो जाएगा? 
इन दावों का पुख्ता आधार खोजने की कोशिश करें तो खासतौर पर रहने, जीने यहां तक कि मृत्यु को भी सुधारने के सबक से भरे हिन्दू धर्मग्रंथों में लिखे प्रलय के संकेतों के आगे दिसंबर 2012 में कयामत के दिन का दावा कमजोर साबित होता है। 
इस संबंध में हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भागवद् महापुराण में लिखी प्रलय के दौरान होने वाली घटनाएं व बनने वाले हालातों को जान आप स्वयं भी अंदाजा लगा सकते हैं कि विनाश के सारे दावों में कितना सच है? अगली तस्वीर पर क्लिक कर जानिए कि अगर दिसंबर में ही कयामत का दिन तो पहले कौन सी घटनाएं घटतीं -

प्रलय का वक्त करीब आने पर सौ साल तक बारिश नहीं होती। अन्न और पानी न होने से अकाल पड़ जाता है। सूर्य की भीषण गर्मी समुद्र, प्राणियों और पृथ्वी का रस सोख लेती है। इसे ही प्रतीक रूप में संकषर्ण भगवान के मुंह से निकलने वाली आग की लपटें बताया गया है। हवा के कारण यह आकाश से लेकर पाताल तक फैलती हैं। इस प्रचण्ड ताप और गर्मी से पृथ्वी सहित पूरा ब्रह्माण्ड ही दहकने लगता है। इसके बाद गर्म हवा अनेक सालों तक चलती है। पूरे आसमान में धुंआ और धूल छा जाते हैं। इसके बाद बने बादल आकाश में मण्डराते हुए फट पड़ते हैं। कई सालों तक भारी बारिश होती है। इससे ब्रह्माण्ड में समाया सारा संसार जल में डूब जाता है। इस तरह पृथ्वी के गुण, गंध जल में मिल जाते हैं और पृथ्वी तबाह हो जाती है और अंत में जल में ही मिलकर जल रूप हो जाती है। इस तरह जल, पृथ्वी सहित पंचभूत तत्व जो इस जगत का कारण माने गए हैं एक-दूसरे में समा जाते हैं और मात्र प्रकृति ही शेष रह जाती है।

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