
जानिए, कैसे होते हैं सच्चे संत और साधु?

मां और प्रेम का होना जीवन में बहुत आवश्यक है। यह जीवन को तृप्त कर देता है। प्रेम के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं है। श्रीजी का ध्यान धरकर दर्शन में जाने से जीवन में सबकुछ आनंदमय हो जाता है। जीवन में खुशहाली आती हे और सब कुछ मिल जाता है।
प्रेम प्रकट हो जाए तो परमात्मा प्रकट हो जाए। बड़ा सीधा सा दो ओर दो चार वाला गणित है। राजा जनक का प्रेम गुप्त था लेकिन राम को देखकर प्रेम प्रकट हो गया। भागवत दर्शन से प्रेम प्राप्त होता है, स्वास्थ्य दर्शन से प्रत्यक्ष प्रेम प्राप्त हो जाता है।
प्रभु के दर्शन से भी प्रेम पनपता है। संत दर्शन भी प्रेम प्रकट करता है लेकिन संत कौन है, इसका निर्णय कैसे करें? 21वी सदी में संत की परिभाषा क्या है? क्या जो धोती, तिलक, छाप, लंगोट में आए वो संत हैं?
संत की कुछ परिभाषाएं तय है। पहली जो किसी भी परिस्थिति में शांत रहे, सहज रहे वो संत है। योजना बनाकर सहज शांत रहने का दंभ भरने वाले संत नहीं हैं। जिस कुल का मनुष्य होता है, उसके व्यक्तित्व में वह कुलीनता प्रकट अवश्य होती है।
तीसरा लक्षण है आश्रमी निष्ठा। जीवन के चारों आश्रमों में उसकी निष्ठा होनी चाहिए। चौथा लक्षण है ज्ञान निष्ठा। पांचवा सुवेष। संत का पहनावा सीधा सदा हो, सात्विक हो, जिसे देखकर श्रृद्धा जागे। छठा लक्षण है आंखों का दर्शन। ऐसी आँख, जिसमे उपासना हो, वासना नहीं। सुनेत्र, सुनयन संत का गहना है। सातवां, संयमित और कम बोलना।
पूज्य बापू की कथा के अंश....










