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यदि शनि चौथे, आठवें और १२वें भाव में हो, तो शिशिर में अत्यधिक सावधानी की जरूरत होती है। आशय यह है कि ऐसे जातक को शिशिर में स्वास्थ्य तो साधना तो चाहिए, लेकिन यह पूरी सावधानी और मार्गदर्शक के प्रभाव में ही करना चाहिए।